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अब फिल्में नहीं बनतीं बॉलीवुड में

दृष्टिकोण. film जंक फूड और जंक फैशन के बाद अब आपका स्वागत है जंक फिल्मों की दुनिया में। जैसा कि हॉलीवुड ने हमें सिखलाया है जंक फिल्मों की पहचान तीन चीजों से आसानी के साथ की जा सकती है- बड़ी स्टार कास्ट, बड़ा बजट और जोरदार प्रचार के जरिये बड़ा शोर-शराबा।

पिछले सप्ताहांत बॉलीवुड ने भी हॉलीवुड को दिखा दिया है कि इस खेल में हम भी उन्हें एक-दो चीजें सिखा सकते हैं। दो भव्य, भारी-भरकम बजट वाली, अतिरेक में प्रचारित और निराशाजनक तरीके से ओवर-रेटेड फिल्मों का प्रदर्शन बॉक्स ऑफिस पर नाटकीय रहा है। दर्शकों को रिझाने की जंग न सिर्फ भारतीय मीडिया में बल्कि दुनिया के हर उस मुकाम पर लड़ी गई जहां-जहां बॉलीवुड की पहुंच है। फिल्मों के प्रचार पर 30 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का दावा है।

दोनों फिल्मों के निर्माताओं और सितारों ने हर उस टीवी चैनल, हर उस शो में बड़बोलापन दिखाया जिसकी कोई पूछ-परख है। उनके बयानों से बॉलीवुड के उस दोहरे मतलब वाली बातचीत के खास अंदाज का आभास हुआ, जिसमें एक-दूसरे से नफरत करने वाले किसी सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे के बारे में बहुत ही अच्छी बातें कहते हैं। बॉलीवुड अपने श्रेष्ठतम के साथ प्रस्तुत था- गर्मजोश, बातूनी और पूरी तरह से बनावटी।

बॉलीवुड जबसे बड़ा कारोबार बन गया है और विदेशी शेयर बाजारों में फिल्मवाले लिस्टेड हो गए हैं, फिल्मों को लेकर शोर-शराबा और हाइप बहुत बढ़ गई है। ऐसे अनसुने दामों पर कापरेरेट्स फिल्में खरीद रहे हैं, बाजार से जिनकी वसूली हो पाना मुश्किल नजर आता है। कुछ अदाकारों और निर्देशकों को इससे तात्कालिक प्रचार जरूर मिल जाता है, मगर मुंबई में प्रापर्टी की कीमतों की तरह यह अवास्तविक और अस्थायी होता है।

मैं शिकायत नहीं कर रहा, बल्कि मुझे अफसोस है कि इस तरीके से हम अच्छी और खराब फिल्मों के बीच के फर्क को धुंधला कर रहे हैं। अब हमारे यहां दो ही तरह की फिल्में होती हैं- हिट और फ्लॉप। फिल्म की कामयाबी टिकट खिड़की पर आमदनी से आंकी जाती है। यह मूर्खतापूर्ण है, क्योंकि अगर आप दुनिया की सौ महानतम फिल्मों की सूची का अध्ययन करें, तो आपको पता चलेगा कि इनमें से 80 फीसदी को शुरुआत में फ्लॉप घोषित कर दिया गया था। ऐसा ‘शोले’ के साथ भी हुआ था।

मौजूदा दौर की मार्केटिंग का मुखौटा पहनाकर धुआंधार प्रचार के जरिये पैदा की गई हाइप ही आज बॉलीवुड को संचालित कर रही है। दरअसल यह सारी मशक्कत किसी भी कीमत पर पहले सप्ताहांत में दर्शकों की भीड़ को खींचने की तिकड़म होती है। आकर्षक पोस्टर, छलावा ट्रेलर- जिनमें अक्सर ऐसे अदाकारों को दिखाया जाता है जो फिल्म में नजर नहीं आते, टीवी पर सेक्सी वीडियो अंश और चतुराई से फैलाई गई अफवाहें; इन सारे नुस्खों को मिलाकर पैदा की जाती है हाइप।

मामूली सी लड़ाई, फर्जी रोमांस और गलतफहमी में संबंध टूटने के दृश्यों का भी बड़ी चतुराई से फायदा उठाया जाता है। मकसद सीधा सा है- पहले सप्ताहांत पर दर्शकों को एक समझदारी और जानकारी भरा चयन करने से रोकना। सोमवार तक सभी को मालूम पड़ चुका होता है कि सचमुच में फिल्म कितनी अच्छा या बुरी है, मगर इरादा उससे पहले बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी का होता है। ताकि सोमवार को सप्ताहांत पर हुई बड़ी आमदनी बताई जा सके।

इस खेल में सटोरिये और पाइरेसी के धंधे में लगे लोग तक भी शामिल हो जाते हैं। सोमवार तक जुनून ठंडा पड़ने लगता है। इस सबका नतीजा क्या होता है? सभी फिल्मों का टिकाउपन सिकुड़ता जा रहा है। जंक फूड और जंक कोला की तरह तात्कालिक आनंद व संतुष्टि के लिए हमें जंक फिल्मों का ओवरडोज मिलता है, जो बॉलीवुड की मुखरता कम होने की पूर्व सूचना है।

इस सबका मतलब यह नहीं है कि मैं कला सिनेमा का प्रचारक हूं। मेरी नजर में दर्शकों के बिना फिल्में उद्देश्यहीनता व मूर्खता हैं। मगर इसका मतलब यह भी नहीं है कि फिल्में उपभोक्ता उत्पादों की तरह हों। भारी- भरकम आमदनी और बेतुका हास्य उस अंतरदृष्टि का विकल्प नहीं हो सकता जो एक बेहतर और टिकाऊ फिल्म बनाने के लिए जरूरी होती है। इसलिए हैरत की बात नहीं है कि दर्शक कुंठित हैं।

जिन अच्छी फिल्मों का ज्यादा शोर-शराबा नहीं होता वह पिट रही हैं। ‘भेजा फ्राय’ और ‘खोसला का घोसला’ भले ही किसी तरह टिकी हों मगर कई फिल्में नाकाम हो गईं। असली फिल्म निर्माता, असली दर्शकों को इससे तकलीफ होती है और आखिरकार इससे बॉलीवुड को भी तकलीफ होगी। आज हम जो देख रहे हैं वह बड़े स्टारों, बड़े बजट वाली जंक फिल्मों का अंतहीन सिलसिला है जिससे कुछ हासिल नहीं है।

इसके बावजूद दावों का कद लगातार बढ़ता जा रहा है। हर फिल्म के लिए दावा किया जाता है कि साल की सबसे बड़ी हिट यही है। हर सितारा अपनी कीमत बढ़ाता रहता है और हर प्रोडक्शन हाउस किसी के भी साथ कई फिल्मों की डील की घोषणा कर सकता है। हकीकत और हाइप के बीच कोई अंतर नहीं बचा है। हम अब क्षणभंगुर की प्राणप्रतिष्ठा कर रहे हैं और बकवास का उत्सव मना रहे हैं।

जंक फिल्मों का सिलसिला नया नहीं है। यह हमेशा से मौजूद रही हैं। मगर बेहतर सिनेमा का जादू जिंदा रखने के लिए राज कपूर, बिमल राय, गुरुदत्त, किशोर कुमार और ऋषिकेश मुखर्जी हमारे पास मौजूद थे। शेखी बघारने का बिंदु बजट नहीं प्रतिभा हुआ करती थी। सितारों को उनकी फिल्मों के लिए जाना जाता था, उनकी फीस के लिए नहीं।

मैं भंसाली का प्रशंसक नहीं हूं मगर उनकी ‘खामोशी’ मुझे पसंद आई। यह एक गंभीर और साफ-सुथरी फिल्म थी जिसे आप बुद्धिमत्तापूर्ण कह सकते हैं। इसके बाद उन्होंने जो भी फिल्म बनाई (शायद ‘हम दिल दे चुके सनम’ को छोड़कर) वह दिखावटी, बोरिंग व आत्मसंतुष्टि के लिए नजर आई। मगर ‘सावरिया’ में तो उन्होंने हद ही कर दी। यह एक कलात्मक मूर्खता है।

जहां तक ‘ओम शांति ओम’ का सवाल है, मुझे फराह की शैली पसंद आई। मगर काश, ‘चक दे इंडिया’ के प्रचार के लिए भी शाहरुख इतनी ही कोशिशें करते, जो बॉलीवुड की श्रेष्ठ 100 फिल्मों में शुमार होगी। इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है? पैसा कमाना जरूरी है, हाइप भी बननी चाहिए। मगर अब वक्त आ चुका है कि हम इसके साथ-साथ फिल्में भी बनाएं।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार व फिल्मकार हैं।





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