Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

काश, हंगामा न बरपे

सम्पादकीय. नंदीग्राम संग्राम और परमाणु करार विवाद के साये में आज शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में देश की गठबंधन राजनीति की विसंगतियों और विद्रूपताओं के एक बार फिर उजागर होने की संभावना है। मानसून सत्र का एक बड़ा हिस्सा परमाणु करार पर हंगामे की भेंट चढ़ गया था। विभिन्न दलों ने नए सत्र में ऐसा नहीं होने देने के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है। यह स्थिति चिंताजनक है।

संसदीय प्रणाली में देश के आमजन की आस्था बनी रहे इसलिए हमारे नुमाइंदों को संसद के दोनों सदनों में अपने आचार-व्यवहार में बदलाव लाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा और कुछ ठोस फैसले भी लेने होंगे। उन्होंने ऐसा नहीं किया तो परमाणु करार और नंदीग्राम जैसे मुद्दे इस सत्र को भी हंगामों की बलि चढ़ा सकते हैं।

लगभग डेढ़ दशक पहले शुरू हुई गठबंधन राजनीति के दौर में संसद में सार्थक बहस के अवसर क्रमश: घटते गए हैं। विपक्ष के साथ ही समर्थन कर रही पार्टियों के हमलों का भी सामना करना सरकार की नियति बन गई है।

दीगर है कि ये पार्टियां सत्ता में हिस्सेदार बने रहने के मोह के मद्देनजर सरकार की खाल खींचने में कुछ सीमाओं का पालन करती हैं। संसदीय प्रणाली में खुद पर कोई जवाबदेही नहीं होने से विपक्ष के पास सरकार पर हमला करने के अवसरों और बहानों की भरमार होती है।

दूसरी तरफ सरकार के पास अपना बचाव करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा कवच नहीं होता और अपने काम को सही साबित करने के लिए वह बहुधा कमजोर और खोखले तर्को का सहारा लेती है। अति तब हो जाती है जब देश की सर्वोच्च पंचायत में बैठे हमारे नुमांइदे जनता से जुड़े मूल मुद्दों पर सार्थक चर्चा करने की बजाय उन मुद्दों को तूल देते हैं जो विवादों और तनावों को बढ़ाते हैं और जिनकी परिणति प्राय: शोरगुल, हंगामे और कार्यवाही ठप होने में होती है।

ऐसी स्थिति में विपक्ष ज्वलंत सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर सरकार की घेराबंदी करने के अवसर गंवा देता है और सरकार भी कठघरे में खड़े होने से बच जाती है। नंदीग्राम और परमाणु करार के मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हैं पर कमर-तोड़ महंगाई, शिक्षा की दुरावस्था, विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में आकंठ भ्रष्टाचार आदि जनता से जुड़े मुद्दे भी गौण नहीं हैं। काश, हमारे नुमाइंदे शोरगुल, हंगामे और कार्यवाही ठप कराने से बाज आकर इन मुद्दों पर भी चर्चा का संकल्प जताएं तो संसद और उसके सत्र ज्यादा सार्थक हो सकते हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: