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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. करोड़ों के सिम्स में आठ एम्बुलेंस होते हुए भी सिम्स प्रबंधन को काल डच्यूटी के लिए आधी रात को किराए पर आटो रिक्शा लेना पड़ा। सिम्स में रात्रिकालीन डच्यूटी पर करीब चार- पांच दिन से कोई वाहन चालक नहीं है। छह चालकों की सुबह व दो चालकों की रात में डच्यूटी लगाई जाती है। एक चालक कुछ दिनों से अवकाश पर है।
इसके बावजूद प्रबंधन ने दूसरे चालक की व्यवस्था नहीं की। मंगलवार की रात दूसरे चालक ने भी गोल मार दिया। रात १२ बजे तक तो सब ठीक चला, लेकिन करीब १२.३क् बजे एक गंभीर मरीज सिम्स में भर्ती कराया गया, जिसे डाक्टरों ने तत्काल आपरेशन की सलाह दी।
इधर आपरेशन की तैयारी के बाद डाक्टर मरीज की नब्ज थामे एनेस्थेटिस्ट का इंतजार करते रहे। बाद में पता चला कि काल वाहन न होने के कारण आधी रात तक काल भेजा ही नहीं गया है।
सर्जन की शिकायत पर अस्पताल अधीक्षक ने सीएमओ पर नाराजगी जाहिर करते हुए तत्काल वाहन की व्यवस्था करने कहा। अंतत: एनेस्थेटिस्ट को आटो में उनके निवास से लाना पड़ा, तब कहीं इमरजेंसी आपरेशन हो सका।
क्या कहते हैं अफसर?
सिम्स के डीन डा.एसएम फुसे का कहना है कि ओएसडी जेपी शर्मा को जानकारी दे दी गई है, अब सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने विवशता जाहिर करते हुए कहा कि क्या करें, वाहन चालक आए दिन छुट्टी मार देते हैं।
सिम्स के प्रभारी अधीक्षक डा. डीआर पाटले ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि यह सीएमओ की जिम्मेदारी है। उन्हें पहले व्यवस्था बनानी चाहिए। मरीज की जान सर्वोपरि है, इसलिए वाहन चालक के अभाव में उसकी प्राणरक्षा के लिए किराए पर आटो लगाना पड़ा।
ओएसडी व डीन को इसकी जानकारी देकर दोषी लोगों पर कार्रवाई की अनंशंसा की गई है। सिम्स के सीएमओ डा. हक ने एनेस्थेटिस्ट को लाने के लिए किराए पर आटो लेने की बात से इनकार किया है। उनका कहना है कि पर्सनल चालक को बुलवाकर व्यवस्था की गई।
खानापूर्ति पड़ सकती है महंगी
कागजी खानापूर्ति के मुताबिक सारे डाक्टर यूनिवर्सिटी के स्टाफ कैंपस में रहते हैं, लेकिन यह कितना सच है, सबको पता है। यही वजह है कि मेडिकल कालेजों में कालेज परिसर में ही डाक्टर आवास व छात्रावास की व्यवस्था रहती है।
यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने सिम्स परिसर में जगह कम होने के कारण यूनिवर्सिटी क्षेत्र में स्टाफ के लिए आवास का निर्माण कराया है। कागज में सब डाक्टरों को आवास भी आबंटित हो चुका है, लेकिन वहां कोई जाने तैयार नहीं है, इसलिए आए दिन कर्मचारियों को डाक्टरों का मकान खोजने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
ऐसी है व्यवस्था
कर्मचारियों को यह तक पता नहीं कि किस डाक्टर का निवास कहां है। ऐसे में डाक्टर का मकान खोजने में ही घंटे भर का समय लगता है। मंगलवार की रात भी कर्मचारी को एनेस्थेटिस्ट डाक्टर का मकान ढूंढ़ने भटकना पड़ा। मोबाइल से संपर्क करने पर महिला डाक्टर ने लोकेशन बताया, तब कहीं मकान मिला।