अभिमत. देश की किसी भी जेल की स्थितियां न तो कानून-सम्मत हैं और न ही मानवीय। आए दिन किसी न किसी जेल में अव्यवस्था और भ्रष्टाचार उजागर होने की खबरें अब आम हो चली हैं, मगर ऐन दिल्ली में स्थित एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ के अधिकारियों ने लगता है नहीं सुधरने की कसम ही खा रखी है।
तिहाड़ जेल में एक विचाराधीन कैदी द्वारा फांसी का फंदा लगाकर खुदकुशी करने की खबर ताजा है। हो सकता है इस आत्महत्या में तिहाड़ जेल के अधिकारियों और यहां की व्यवस्था का कोई दोष न हो मगर अब इस जेल पर आर्थिक अनियमितताओं के आरोप भी लग गए हैं। जेल में सजा भोग रहे कैदियों से बढ़ईगीरी, बुनाई, सिलाई, बेकिंग और कागज बनाने जैसे काम करवाए जाते हैं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का आरोप है कि इसके लिए कैदियों को बहुत ही कम, प्रतिदिन 12 से 30 रुपए मेहनताना चुकाया जाता है। जबकि जेल इस सामग्री की बिक्री से भारी मुनाफा कमा रहा है। नियमानुसार कैदियों को मिलने वाली रकम का एक हिस्सा उनके परिजन को चुकाया जाना चाहिए।
आयोग को आशंका है कि जेल के अधिकारी इस कर्तव्य को निभाना जरूरी नहीं समझते। मानवाधिकार आयोग के एक सदस्य पिछले माह जब जेल में व्याख्यान देने गए तब इस अनियमितता का पता चला। आयोग ने स्वत: संज्ञान लिया तथा जेल के महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे जेल की औद्योगिक इकाइयों की आय और व्यय का ब्योरा पेश करें।
हेराफेरी में माहिर जेल अधिकारी इस मामले में कहीं फंस पाएंगे इसकी उम्मीद कम ही है। सजा का उद्देश्य यह होता है कि अपराधी अपने किए पर पश्चाताप कर सके और जेल से बाहर आने के बाद एक अच्छा नागरिक बने। मगर लगता है हमारे देश की जेलें इस मकसद के साथ काम करती हैं कि कैदी और भी बड़ा अपराधी बनकर बाहर निकले।