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सख्त श्रम कानून से कमजोर होते रोजगार के अवसर

आलेख. business अगर कोई इस बुनियादी अवधारणा को स्वीकार करता है कि भारतीय कंपनियां अपने काम की आउटसोर्सिग मुख्यत: लागत के कारण करती हैं, तो आशंका है कि वे अपने कर्मचारियों, ग्राहकों और कारोबार के दीर्घकालीन हितों के साथ समझौता कर रही होंगी।

वसूली के लिए जो क्रेडिट कार्ड कंपनी गुंडों का इस्तेमाल करती है, आज नहीं तो कल वह ग्राहकों का भरोसा खो देगी। कोई कंपनी अगर पूर्व में दी गई सेवाओं की गुणवत्ता की जांच किए बिना किसी सस्ते ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर की सेवाएं लेती है तो बाद में पता चलेगा कि कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधा के साथ समझौता किया गया है।

संक्षेप में, यदि कंपनियां ग्राहकों व कर्मचारियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को कम करने के मकसद से आउटसोर्सिग का इस्तेमाल करती हैं, तो इसके परिणामों के लिए उन्हें खुद को ही दोषी मानना होगा। फिर भी, इस मामले का एक पहलू और है। हमें देखना होगा कि कंपनियां इस तरह के मूर्खतापूर्ण काम क्यों करती हैं। दो मुख्य कारण सामने आते हैं: सख्त श्रम कानून और कमजोर विधि प्रणाली।

भारतीय श्रम कानूनों के तहत कर्मचारियों को काम से हटाना लगभग असंभव है। जो कंपनियां कर्मचारियों को निकाल नहीं पातीं, वह नौकरियां भी नहीं देतीं। जिन कामों के लिए निम्न स्तर के कौशल की जरूरत होती है, उनके लिए संगठित क्षेत्र की कोई भी कंपनी लोगों को नौकरी पर रखना नहीं चाहती, भले ही इस तरह के काम के लिए कितनी ही रिक्तियां क्यों न हों।

एसोचैम द्वारा कराए गए अध्ययन से खुलासा हुआ है कि 1998 से 2003 के बीच आर्थिक वृद्धि की औसत दर 5.3 प्रतिशत रही, फिर भी संगठित क्षेत्र में 4.14 फीसदी रोजगार घट गया था। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि 1997 और 2004 के बीच संगठित क्षेत्र में नौकरियों में एक फीसदी की कमी आई जबकि असंगठित और कम-गुणवत्ता रोजगार में आठ प्रतिशत का इजाफा हुआ। लगता है फलती-फूलती अर्थव्यवस्था हमारे लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियां मुहैया कराने में पर्याप्त सक्षम नहीं है।

आउटसोर्सिग नौकरियों की संख्या घटाने का एक तरीका है। ड्राइवरों, सुरक्षाकर्मियों और प्रशासकीय स्टाफ की भर्ती तो कंपनियों ने पहले ही बंद कर दी थी, मगर हाल ही में उच्च क्षमता के मानव संसाधन, वित्त और वेतन पत्रक जैसे कामों के लिए भी आउटसोर्सिग की शुरुआत कर दी गई है।

यह सही है या गलत, इसका पता लगाने का एक ही तरीका है- कंपनियां खुद से एक सीधा सा सवाल करें: क्या वे ऐसा सिर्फ लागत घटाने के लिए कर रही हैं या फिर अपने भीतरी और बाहरी ग्राहकों के लिए अधिक ‘वैल्यू’ पैदा करने के लिए कर रही हैं? अगर लागत में कमी और ‘वैल्यू’ में बढ़ोतरी, दोनों ही अर्जित किए जा सकें तो आउटसोर्सिग एक बेहतर राह है।

यदि ऐसा नहीं है तो किसी काम को ‘इन-हाउस’ करना ही बेहतर होगा। सख्त श्रम कानूनों की वजह से आज कंपनियों को खुद से यह सवाल करने की कोई परवाह नहीं है। उनके लिए आज यही बात सही है कि कंपनी में कम से कम स्टाफ होना चाहिए, क्योंकि अधिक स्टाफ का मतलब श्रम कानूनों की वजह से अधिक समस्याओं का सामना करना है।

जहां तक कम साफ-सुथरे काम का सवाल है, कमजोर विधि प्रणाली के चलते श्रमिकों की संख्या घटाना और काम आउटसोर्सकरना ज्यादा सुविधाजनक बन जाता है। बैंकें आज अगर ऋण वसूली के लिए अर्ध-अपराधियों की सेवाएं ले रही हैं, तो इसलिए कि वह जानती हैं कि हमारा कानून उन्हें डिफाल्टर को उसके घर से बाहर बुलाने या उसकी संपत्ति नीलाम करने की इजाजत कभी नहीं देगा।

इस समस्या से निजात पाने के लिए कुछ दिनों पहले तक बैंकों और क्रेडिट कार्ड कंपनियों ने उन लोगों के साथ समझौता कर लिया जो कानून के खिलाफ काम करते हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ ग्राहक जब उठ खड़े हुए तो अब वसूली की स्थितियां बदतर होने की आशंका है।

सीधी सी बात है, अपने श्रम कानूनों और विधि प्रणाली में हमें तत्काल सुधार की जरूरत है। मगर हमारी राजनीतिक पार्टियों को यह काम प्राथमिकता से करने की जरूरत नजर नहीं आती।

उन्हें इस बात पर भरोसा करना ही अच्छा लगता है कि पल्लवित होती अर्थव्यवस्था की बजाय पुरातन कानून श्रमिकों के ज्यादा हित में हैं। वह कारगर विधि प्रणाली के पूरी तरह विरोध में हैं। इन मामलों में जल्द ही किसी सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा।





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