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सिर्फ सेना के बस की बात नहीं

दृष्टिकोण. militant कुछ समय पहले तक पाकिस्तानी सेना को अपने पड़ोसी देशों में आतंकवादी गतिविधियों को प्रश्रय देने में महारत हासिल थी। उसने आतंकियों को प्रशिक्षण और हथियार देकर 1990 के बाद से कश्मीर में और उसके पहले अफगानिस्तान में छद्म-युद्ध के हालात पैदा किए थे लेकिन अब हालात उलट गए हैं और उसे खुद अपने द्वारा खड़े किए गए जिन्न से जूझना पड़ रहा है।

अफगानिस्तान में आतंकी गतिविधियां चलाने के लिए पाकिस्तान ने अपनी पश्चिमी सीमा के कबीलाई इलाकों में जिन तालिबान लड़ाकों को तैयार किया था वे अब इस्लामाबाद में बैठे अपने-अपने आकाओं के खिलाफ लामबंद हो गए हैं।

इसी तरह भारत में आंतकी गतिविधियां चलाने के लिए तैयार किए गए आतंकवादियों के जत्थे लाल मस्जिद में कार्रवाई के बाद से पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ आग-बबूला हैं। इसके अलावा वजीरिस्तान और स्वात इलाकों में आत्मघाती हमलों ने पाकिस्तान के सैनिक हुक्मरान की नाक में दम कर रखा है।

पाकिस्तान पर लगातार नजर रखने वाले पर्यवेक्षकों के लिए वहां के मौजूदा हालात पर आश्चर्य करने जैसी कोई बात नहीं है। वहां की सेना को आतंकवाद से निपटने का कोई अनुभव तो नहीं ही है, साथ ही जनरल मुशर्रफ भी दीवार पर लिखी इबारत पढ़ पाने में नाकाम रहे हैं। लाल मस्जिद पर सेना की कार्रवाई और भारत में स्वर्ण मंदिर में 1984 में की गई कार्रवाई में कई समानताएं हैं।

स्वर्ण मंदिर की कार्रवाई से सिखों की भावनाएं बुरी तरह आहत हुई थीं तथा इंदिरा गांधी व ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय भारतीय सेना के प्रमुख रहे जनरल एएस वैद्य की हत्याएं इसी ऑपेरशन की प्रतिक्रिया में हुई थीं। इसलिए लाल मस्जिद में सेना की कार्रवाई की मुखालफत करने वाले गुटों के समर्थकों द्वारा पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाया जाना कतई आश्चर्यजनक नहीं है।

यदि भारत के अनुभव को पैमाना माना जाए तो पाकिस्तान में सेना विरोधी भावनाएं एक दशक में भी ठंडी नहीं पड़ने वाली हैं और आतंकी गतिविधियां तो और भी लंबे समय तक चल सकती हैं। दुर्भाग्य से दक्षिण एशिया के लगभग सभी देश किसी न किसी रूप में आतंकवाद के शिकार हैं और उनकी सेनाओं को अपने ही लोगों से जूझना पड़ रहा है।

भारत का ही उदाहरण लें। आजादी के बाद से उसे उत्तर-पूर्व में जातीय और आदिवासी समूहों की विद्रोही गतिविधियों से जूझना पड़ा है। पचास के दशक में नगा विद्रोहियों की गतिविधियां चरम पर थीं, फिर क्रमिक रूप से मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा और असम में इन गतिविधियों ने काफी कोहराम मचाया।

भारत सरकार ने सभी विद्रोही गुटों के साथ कई दौर की शांति वार्ताएं कीं और संघर्ष-विराम के भी कई समझौते हुए, मगर पूरी शांति अभी तक कायम नहीं हो सकी। फिर 1990 के दशक में पाकिस्तान ने कश्मीर को भारत से अलग करने के मंसूबे से वहां हिंसक मुहिम को बढ़ावा दिया। मुस्लिम देशों के एकछत्र अगुवाकार बनने की गरज से उसने अफगानिस्तान से लेकर चेचन्या तक में आतंकी गतिविधियों को प्रश्रय देने में कोई कसर नहीं रखी।

श्रीलंका के आजाद होने के बाद से ही वहां के बहुसंख्यक सिंहली अल्पसंख्यक तमिलों को हाशिये पर धकेलने की कोशिश में लग गए। उन्हें शिकायत थी कि ब्रिटिश शासन के दौरान तमिलों को अनावश्यक तरजीह दी गई। सिंहली बहुल निर्वाचित सरकारों ने सिंहलियों के पक्ष में कई कानून बनाए। नतीजतन, तमिलों में अलगाव की भावना गहराती गई।

1984 के बाद से श्रीलंकाई सेना लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के खतरनाक जांबाजों से जूझते हुए हजारों सैनिक गंवा चुकी है। लिट्टे के छापामार दस्ते बेहद निर्मम और जुझारू हैं और उनकी वजह से श्रीलंका में शांति बहाल होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। तमिल आजादी की मांग कर रहे हैं और श्रीलंका सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। नतीजे में यह सुंदर-सलोना द्वीप राष्ट्र न सुंदर रह गया है और न ही सलोना।

इसके बाद हम जरा हिमालय की तलहटी में बसे नेपाल के हालात पर गौर करें। वहां पिछले कुछ वर्षो से माओवादियों का दबदबा कायम है। हालांकि वहां भी विद्रोही गतिविधियों के बीज 1960 के दशक में ही तब पड़ गए थे जब नेपाल नरेश महेंद्र ने निर्वाचित सरकार को बरखास्त तथा संसद को भंग कर सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे। उन्होंने राजनीतिक दलों पर भी रोक लगा दी थी।

पिछले कुछ वर्षो में माओवादी विद्रोहियों ने लगातार हिंसक गतिविधियां चलाकर नेपाली सेना को कुछ शहरों तक सीमित कर दिया था। आज यह माओवादी नेपाल की सरकार को अपनी शर्तो पर चलने के लिए मजबूर कर देने की स्थिति में आ गए हैं और नेपाल नरेश और उनके मददगार पूरी तरह हाशिये पर चले गए हैं।

इन अनुभवों का सबसे बड़ा सबक यह है कि आप केवल सेना के दम-खम पर विद्रोही और आतंकी गतिविधियों पर पार नहीं पा सकते हैं। ये गतिविधियां राजनीतिक-सैन्य विवादों की श्रेणी में आती हैं और इन्हें राजनीतिक तरीके से ही हल किया जा सकता है। सेना की ताकत विद्रोही गतिविधियों को तब तक सीमित रखने में मददगार जरूर हो सकती है जब तक कि समस्या का हल नहीं निकल आता।

कुछ समय के लिए हिंसक गतिविधियां थमने को सत्ता में बैठे लोग शांति का संकेत मानने कीगलती करते हैं लेकिन ऐसी स्थिति में विद्रोही या आतंकवादी तत्व खुद को फिर से संगठित करने में लगे रहते हैं और फिर मौका ताड़कर अपनी पसंद की जगह पर और भी बड़ी घटना को अंजाम दे देते हैं।

इसके लिए आप अफगानिस्तान का उदाहरण देख सकते हैं। वहां अमेरिकी बमबारी शुरू होने पर तालिबान कुछ समय के लिए तितर-बितर से नजर आने लगे। इस काम में पाकिस्तान ने भी उनकी भरपूर मदद की। लेकिन अब वे फिर से और पूरी ताकत से सक्रिय हो गए हैं। न केवल पाकिस्तान के पश्चिमी कबीलाई इलाकों में बल्कि लगभग पूरे देश में हथियारबंद तालिबान और कबीलाई लोग पांच लाख सैनिकों की फौज को नाकों चने चबवा रहे हैं।

सेना पर सीमाओं की पहरेदारी की भी जिम्मेदारी है। विद्रोहियों से निपटने के लिए उसकी ताकत नाकाफी है। पाकिस्तान में तालिबान और जेहादियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है और यह कुछ ही दिनों में वहां की सेना की आधी तक भी पहुंच सकती है। और अगर अपने आकाओं की तरह अच्छे हथियार भी उनके हाथ लग जाएं तो जनरल मुशर्रफ उनसे अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे होंगे।

-लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं।





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