सम्पादकीय. भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कोच ग्रेग चैपल को इस बात का इलहाम होना काबिले गौर है कि उड़ीसा के कटक में एक क्रिकेटप्रेमी द्वारा उन पर किया गया हमला वास्तव में नस्लभेदी हमला था। जो देश और जिसके लोग नस्लभेद के दंश को लंबे समय तक झेल चुके हों उन पर नस्लभेद का आरोप मढ़ा जाना एक नई और सरासर बेतुकी प्रवृत्ति है।
इस प्रवृत्ति को हाल की एक दिवसीय क्रिकेट मैचों की सीरीज के दौरान सबसे पहले ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने तूल दिया, फिर भारत और दूसरे देशों में भी इसकी अनुगूंज हुई।
भारतीय दर्शकों के एक वर्ग द्वारा ऑस्ट्रेलियाई आल राउंडर एंड्रयू सायमंड्स को बंदर की मुद्रा बनाकर चिढ़ाए जाने को नस्लभेदी कृत्य करार देने वाले लोगों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है। क्रिकेट के इतिहास में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे जब दर्शकों ने किसी एक खिलाड़ी को निशाना बनाकर उसके साथ मजाक किया हो, नारेबाजी की हो या फिर उसे कोई मजाकिया नाम दिया हो।
पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इंजमाम-उल-हक के लिए ‘आलू’ संबोधन का प्रयोग तो आम था। उन्होंने तो कभी कोई शिकायत नहीं की मगर सायमंड्स को न जाने कहां से नस्लभेद का जुमला मिल गया जो अब यहां-वहां दोहराया जा रहा है।
मैदान में प्रतिस्पर्धी खिलाड़ियों की एकाग्रता भंग करने के लिए ऊटपटांग छींटाकशी करने और फिकरे कसने को खेल का अनिवार्य अंग मानने वाली ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके गुरु ग्रेग जब ऐसा आरोप लगाते हैं तब लगता है कि उन्हें खेल भावना से रत्तीभर भी लेना-देना नहीं है। उन्होंने नस्लभेद के दंश कभी देखे-सहे नहीं हैं इसलिए उन्हें शायद यह भी पता नहीं हो कि नस्लभेद आखिरकार होता क्या है।
नस्लभेद के बारे में जानना हो तो उन्हें पहले महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग या नेल्सन मंडेला के जीवन-संघर्ष और उनके अनुभवों को जान लेना चाहिए। गोरी चमड़ी वाला कोई व्यक्ति भूरी या काली चमड़ी वाले किसी व्यक्ति या समाज पर जब नस्लभेद के आरोप लगाता है तो उसे नस्लभेद का थोड़ा-बहुत इतिहास भी पढ़ लेना चाहिए।
नस्लभेद को जन्म देने और उसे सबसे घृणित रूप में इस्तेमाल करने का इतिहास गोरी चमड़ी वालों का ही रहा है। यह इतिहास जान लेने के बाद चैपल या उन सरीखे लोग इसका आरोप लगाने की बजाय बगले झांकते ही नजर आएंगे।