Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे. सारे फिल्मकार और होटल के मालिक शुक्रवार शाम से इतवार देर रात तक के लिए अपने दर्शकों और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए प्रचार के
लाखों जतन करते हैं, क्योंकि इसी दौरान लोगों के पास जीवन की भागमभाग से बचकर मनोरंजन और पेट-पूजा के लिए वक्त होता है। महानगरों के मल्टीप्लैक्स में सप्ताहांत की टिकट दरें ऊंची होती हैं और सुस्वादु भोजन वाले ठियों पर भी स्थान आरक्षित करना होता है। दरअसल मनोरंजन और भोजन में गहरा रिश्ता है और इन क्षेत्रों की रुचियां इनके पारस्परिक रुझान से प्रभावित भी होती हैं।
हाल ही में प्रदर्शित ‘सावरिया’ और ‘ओम शांति ओम’ के फिल्मकारों में प्रथम सप्ताहांत में अधिक भीड़ एकत्रित करने के लिए कड़वी प्रतिस्पर्धा हो गई और वर्षो के मित्रों के बीच कटुता उत्पन्न हो गई। प्रचार के हर अवसर को इतनी गहराई से भुनाया गया कि दो नवंबर को अपने जन्मदिन पर शाहरुख ने सारे चैनल वालों के साथ दर्जन भर केक काटे और रस्म अदायगी के छोटे से टुकड़े खाकर उसने वर्ष भर का मीठा खा लिया।
दरअसल बाजार के इस नए युग में सप्ताहांत का महत्व बहुत बढ़ गया और इस दौर के विभाजित मनुष्य का यह प्रतीकात्मक विवरण भी प्रस्तुत करता है। उसने जीवन को खांचों में विभाजित कर लिया है और काम के घंटे मनोरंजन के घंटों से जुदा हो गए हैं। गोया कि उसे अपने काम में भरपूर आनंद नहीं मिल रहा है और मनोरंजन में उसे काम नजर नहीं आ रहा है। इतना ही नहीं दोनों आंखों के बीच के सामंजस्य के समाप्त होने से उसे जीवन का लक्ष्य ही नहीं दिख रहा है। आज उसके लिए द्रोपदी को वरना कठिन हो गया है। अब कृष्ण ही राह दिखा सकते हैं।
दरअसल यह सप्ताहांत संस्कृति हमने पश्चिम से ग्रहण की है, जहां सप्ताहांत में कोई कार्य नहीं करता और गरीब देशों से गए लोग इस समय काम करके अतिरिक्त डॉलर कूट लेते हैं। हमने हमेशा समग्र का अध्ययन किया है और सभी चल-अचल वस्तुओं में प्राण के होने को स्वीकार किया है। विभाजित जीवन हमारा दृष्टिकोण नहीं है, परंतु बाजार के सर्वव्यापी संसार में आदमी का खंडित होना उनके लिए आवश्यक है, क्योंकि ऐसा आदमी ही अनावश्यक चीजों को खरीद सकता है और बाजार की चकाचौंध में स्वयं सिक्के की तरह खर्च हो सकता है। याद आती हैं आलोक श्रीवास्तव की पंक्तियां,
‘लफ्जों की दुनियादारी में आंखों की सच्चाई क्या?
मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूठी बातें सच।
कच्चे रिश्ते, बासी चाहत और अधूरा अपनापन।
मेरे हिस्से में आई हैं ऐसी ही सौगातें सच।
बहरहाल फिल्मकार जानता है कि सप्ताहांत में 100 करोड़ तक का व्यवसाय हो सकता है। इसलिए वह फिल्म निर्माण के पहले चरण में ही फिल्म के प्रोमो और प्रचार पर
सोचना प्रारंभ करता है और पूरी सृजन प्रक्रिया प्रथम सप्ताहांत पर केंद्रित हो जाती है। अब ऐसी विचार प्रक्रिया हो तो कालजयी सामाजिक कृति का सवाल ही नहीं उठता। फिल्म चिंतन में सप्ताहांत शनि की तरह विराजमान हो चुका है। सप्ताहांत पर दर्शक का मूड लतीफेबाजी का होता है। उसे उत्तेजना भी कैप्सूल में पैक चाहिए। पॉपकॉर्न महज समय काटने के लिए चबाने की चीज नहीं रहकर एक जीवनशैली की प्रतीक हो गया है।
प्राय: लोग सारी खुशी और गम सप्ताहांत के लिए आरक्षित रखते हैं। शायद प्रेम भी केवल सप्ताहांत का पॉपकॉर्न रह गया है। बच्चों के प्रति प्यार का कोटा भी आरक्षित है। गोया कि सोमवार से शुक्रवार तक जीवन का अभिनय चलता है और जीते सिर्फ सप्ताहांत में ही हैं। एक विख्यात उद्योगपति की मृत्यु मंगल को हुई परंतु शेयर बाजार को बचाने के लिए मृत्यु की घोषणा शनिवार को की गई। विदेशों में तो घोषणा उसी दिन करते हैं, परंतु शवयात्रा सप्ताहांत को ही निकलती है। इसका यह अर्थ है कि सप्ताहांत में चित्रगुप्त का काम बढ़ जाता है और विश्राम कक्ष में आत्माएं इंतजार करती हैं। अनेक दफ्तरों में सोमवार की सुबह गफलत का समय होता है, क्योंकि इतवार की रात का खुमार छाया रहता है। हम कितने विचित्र हैं कि सप्ताह में मात्र दो दिन ही जीते हैं अर्थात उम्र के बहीखाते में गणित को बदलना होगा। हर वर्ष 365 दिनों में से 102 दिनों को ही गिनना चाहिए।