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सलमान मीडिया से बहुत कम बात करते हैं और जब करते हैं, तो दिल खोलकर करते हैं। हाल ही में उनसे मुलाक़ात हुई और बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो उन्होंने वो बातें भी कीं, जिनकी उनसे उम्मीद नहीं थी..
‘सावरिया’ की वजहवरिया’ करने के पीछे कई कारण थे। सब जानते हैं कि संजय लीला भंसाली मेरे काफ़ी अच्छे दोस्त हैं। दूसरे, ‘बाजीराव-मस्तानी’ (सलमान-ऐश्वर्या राय स्टारर यह फिल्म इन दोनों के ब्रेकअप के कारण बंद हो गई) की मेरी डेट्स संजय के पास थीं। वे डेट्स ‘सावरिया’ में ख़र्च करने का मौक़ा था। तीसरे, इस फिल्म की स्क्रिप्ट मुझे अच्छी लगी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इसमें मेरे किरदार का नाम इमान है। डैडी (सलीम ख़ान) को यह नाम इतना प्रिय है कि वह मेरा नाम इमान ही रखना चाहते थे। इमान बड़ा प्यारा कैरेक्टर है- ऊपर से कठोर और अंदर से नर्म। स्वभाव से रूखा है, मगर सैंस ऑफ ह्यूमर ज़बरदस्त है। मेरे लिए यह कैरेक्टर निभाना चुनौतीपूर्ण रहा। वह इसलिए कि इस फिल्म से दो न्यूकमर (ऋषि कपूर के बेटे रणवीर और अनिल कपूर की बेटी सोनम) लांच हो रहे हैं। चुनौती यह थी कि सलमान पर्दे पर दिखना भी चाहिए और इतना भी नहीं दिखना चाहिए कि दर्शक न्यूकमर को ही देखना भूल जाएं। ख़ैर, यह फिल्म रणवीर और सोनम की है। ये दोनों बेहद टैलेंटेड हैं। भविष्य के सुपर स्टार हैं ये।
‘भंसाली पाई-पाई फिल्म में लगा देते हैं’
संजय लीला भंसाली को मैं एक दशक से जानता हूं। वह ‘ख़ामोशी-दि म्यूÊिाकल’ के लिए मुझसे मिले थे। उस फिल्म को करने से सारे स्टारों ने इन्कार कर दिया था, क्योंकि वह न्यू कमर थे। वह फिल्म करने के लिए भंसाली ख़ुद को मेरा अहसानमंद समझते हैं, जबकि मैंने वह फिल्म अच्छे रोल की ख़ातिर की थी। मैंने शुरू से ही उन्हें बड़ा समर्पित डायरैक्टर पाया है। मुझे याद है कि ‘ख़ामोशी’ के सैट पर कोई मुझे फूल दे गया था। संजय ने वही फूल एक शॉट में इस्तेमाल कर लिए, ताकि फूलों के पैसे बच जाएं। एक ओर वह कंजूसी करते हैं, दूसरी ओर भव्यता के चक्कर में उनकी हर फिल्म ओवर बजट होती है और वह अपनी जेब की पाई-पाई फिल्म में लगा देते हैं। अभी दो-ढाई साल पहले की बात है, जब उनकी ‘ब्लैक’ अंडर प्रोडक्शन थी। वह दुकान में एक कंप्यूटर देखकर आए थे, जिसे वह ख़रीदने वाले थे। मुझे इस बात की जानकारी थी। कुछ दिनों बाद बातों-बातों में संजय ने बताया कि 20-22 हज़ार का वह कंप्यूटर बहुत पसंद होने के बावजूद वह ख़रीदकर घर नहीं लाए हैं। मैंने कारण पूछा, तो झुंझलाकर बोले- ‘पैसे हों, तब तो ख़रीदूं! मेरे पास पैसे ही नहीं बचे हैं।’
‘मैं आधा हिंदू आधा मुस्लिम हूं’
मैं आधा हिंदू, आधा मुस्लिम हूं। मेरी मां महाराष्ट्रियन और पिता मुस्लिम हैं। हमारा परिवार ऐसा है, जहां सारे धर्म आपस में गुंथे हुए हैं। मैं सारे धर्मो का आदर करता हूं। इसीलिए मुस्लिम त्योहारों के अलावा होली-दीवाली, नवरात्रि, लोहड़ी आदि भी उसी चाव से मनाता हूं।
‘बहुत बोर एक्टर हूं मैं’
मैं सबसे बोर एक्टर हूं। मैं आज जहां हूं, उसके शायद दो ही कारण हैं। एक यह कि मैं राइटर का बेटा हूं, इसलिए मुझे स्क्रिप्ट-सैंस Êारा बेहतर है। मैं अच्छी स्क्रिप्ट चुनना जानता हूं। हालांकि मैंने बुरी स्क्रिप्ट चुनने की ग़लतियां भी ख़ूब की हैं, पर मैं उन फिल्मों के नाम नहीं लूंगा। दूसरा कारण है, मेरी क़िस्मत। मैं ख़ुशनसीब हूं कि मुझे अच्छे मौक़े मिले और मैं चलता चला आ रहा हूं।
‘वो दिन भी याद हैं..’
मुझे वो दिन याद हैं, जब ‘मैंने प्यार किया’ रिलीज़ होने के 6 महीने बाद तक कोई प्रोडच्यूसर मुझे साइन करने नहीं आया था। फिल्म सुपरहिट थी, मगर इसकी सफलता का श्रेय ‘राजश्री’ बैनर को दिया जा रहा था। सलमान को कोई पूछ नहीं रहा था। तब मेरे डैडी मेरा हाथ पकड़कर जी.पी. सिप्पी (प्रोडच्यूसर) के पास ले गए और उनसे कहा- ‘आप भले ही फिल्म मत बनाना, मेरे बेटे को साइन करके फिल्म सिर्फ़ एनाउंस कर दो, वर्ना मेरे बेटे का कुछ नहीं हो पाएगा।’ ख़ैर, वे दिन देखना भी Êारूरी था, वर्ना मैं काम की इतनी इ•ज़त नहीं कर पाता।
‘डैडी से डरता हूं’
डैडी घर के मुखिया हैं और हम सब पर उनका हुक्म चलता है। किसकी मजाल है, जो उनसे ज़ुबान लड़ाए या नÊारें मिलाकर बात करे। मैं भी उनसे बहुत डरता हूं। वह डर असल में तहÊाीब है। अभी पिछले दिनों मैं सोफे पर तनकर बैठा हुआ टीवी देख रहा था। मुझे पता ही नहीं था कि डैडी मेरे पास खड़े हुए मुझे देख रहे हैं। उनको लगा कि शायद उनकी उपस्थिति का एहसास होने के बावजूद मैं उद्दंडता से बैठा हूं। उन्होंने गुस्से से टोका- ‘यह बैठने का तरीक़ा है तुम्हारा!’ और मैं झट-से उठकर खड़ा हो गया।
‘लोग फंसाते हैं मुझे’
मैं कैसे सफ़ाई दूं कि मैं वैसा उपद्रवी इंसान नहीं हूं, जैसी मेरी इमेज बना दी गई है। मेरे सीनियर्स से पूछिए, सहकर्मियों से पूछिए.. क्या मैंने किसी को इ•ज़त देने में कभी कोई कमी की है। हां, कुछ ग़लतियां मुझसे भी हो सकती हैं, क्योंकि मैं भी इंसान हूं। कई बार तो कहानियां गढ़ने के लिए जान-बूझकर मुझे विवादों में फंसाते हैं लोग। कुछ दिन पहले की बात है। मैं अपनी गाड़ी में बैठा हुआ था कि एक आदमी ने धाड़ से मेरी गाड़ी पर हाथ मारा। मैं तिलमिलाया, सोचने लगा कि इसने आख़िर ऐसा क्यों किया। ध्यान से देखा, तो दूर एक सज्जन कैमरा ताने छिपे खड़े थे। वे मीडिया के लोग थे। उनको उम्मीद थी कि मैं गाड़ी से उतरूंगा, हाथ-पैर चलाऊंगा और चैनल को एक नई स्टोरी मिलेगी। पर मैंने उन्हें निराश कर दिया। मैं इस मामले में अब काफ़ी मैच्योर हो गया हूं।
‘बहुत पिटता था मैं’अब तो टीचर पिटाई कर दे, तो पुलिस केस बन जाता है, मगर मेरे बचपन में उल्टा था। मुझे तो टीचर जी-भर कर पीटते थे। मुझे अपने सिंधिया स्कूल की पिटाई याद है। आमतौर पर होमवर्क पूरा न होने या सहपाठी से झगड़ा करने जैसी साधारण ग़लती की सÊा होती थी- तीन बेंत। इसके लिए सीट से बुलाकर क्लास रूम में ब्लैक बोर्ड के पास पोजीशन में खड़ा किया जाता था। आपको बताऊं कि मेरे टीचर सीट से ब्लैक बोर्ड तक मुझे मारते हुए ही ले जाते थे। इस तरह सÊा के 3 बेंत खाने से पहले ही मैं 12-14 बेंत खा चुका होता था। फिर घर पर शिकायत पहुंचती थी और वहां अलग पिटता था। बहरहाल, मैं एवरेज से Êारा ऊपर का स्टूडैंट था। पास हो जाना बड़ी बात थी मेरे लिए। लेकिन जब बोर्ड (10वीं) के इम्तिहान में 60 फ़ीसदी मार्क्स लेकर आया, तो सबके साथ-साथ ख़ुद मैं भी हैरान था।
‘अगले साल मालामाल’
अगले साल मेरी ढेर सारी फिल्में आएंगी। दो फिल्में तो गोविंदा के ही साथ हैं- ‘पार्टनर-2’ और ‘मैं और मिसेज़ खन्ना’। रूमी जाफरी की ‘गॉड तुसी ग्रेट हो’ (प्रियंका चोपड़ा), समीर कर्णिक की ‘मेरा भारत महान’ (प्रिटी ज़िंटा), सुभाष घई की ‘युवराज’ (कैटरीना)..वग़ैरह कई फिल्में हैं।
बॉडी न हो, तो बीवी भी नहीं देखती
यह Êारूरी है कि हमारे दर्शक हमारी बॉडी से भी इंप्रैस हों। हीरो अच्छा नहीं दिखेगा, तो दर्शक दूर, ख़ुद की बीवी भी देखना पसंद नहीं करेगी। अच्छी बॉडी हमारे प्रोफैशन की बहुत बड़ी Êारूरत है। आज बॉलीवुड में सभी सिक्स पैक एब्स के पीछे हैं। पर मेरा मानना है कि कुछ तो बॉडी बनाई जाती है, कुछ यह क़ुदरत की देन भी है। जहां तक मेरा सवाल है, मैं रोज़ नियमित व्यायाम नहीं कर पाता। जब मूड हो और टाइम भी हो, तभी कसरत करता हूं। मैं अपने डाइटीशियन को भी अक्सर निराश करता हूं। गिनकर कैलोरी और सही अनुपात में प्रोटीन व विटामिन लेना मेरे बस की बात बिल्कुल नहीं है। लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूं कि बेहतर बॉडी के लिए मुझे इन सब चीÊाों का ध्यान रखना ही होगा।
अब स्क्रिप्ट नहीं लिखूंगासलमान कहते हैं, ‘मैं राइटर का बेटा Êारूर हूं, मगर ख़ुद सक्सैसफुल राइटर नहीं हूं। मैंने शौक़िया तौर पर अपनी तीन फिल्में ‘चंद्रमुखी’, ‘सूर्यवंशी’ और ‘बाग़ी’ लिखी थीं। इनमें से एक-दो फिल्मों के प्रोडच्यूसर की दुकान के साथ-साथ मकान भी बिक गया। इसलिए मैंने अपने लिखने के शौक़ का गला घोंट रखा है। किसी प्रोडच्यूसर से दुश्मनी निकालनी होगी, तो उसके लिए Êारूर लिखूंगा (हंसते हुए)।