अभिमत. स्वदेश में विकसित क्रायोजेनिक स्टेज के सफल परीक्षण के साथ भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की उपलब्धियों में एक और नगीना जुड़ गया है। तमिलनाडु के महेंद्रगिरि में स्थित लिक्विड प्रपल्जन सिस्टम्स सेंटर में किया गया यह जटिल परीक्षण देश को जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लांच व्हेकिल (जीएसएलवी) के प्रक्षेपण में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
इससे जीएसएलवी के प्रक्षेपण में रूस पर हमारी निर्भरता खत्म हो जाने की उम्मीद है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के प्रमुख जी माधवन नायर की मानें तो अगले वर्ष के मध्य में प्रक्षेपित किए जाने वाले जीएसएलवी में स्वदेश में बने क्रायोजेनिक स्टेज का ही इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि विकल्प के रूप में इस्तेमाल के लिए दो रूसी क्रायोजेनिक स्टेज हमारे पास पहले से हैं।
क्रायोजेनिक स्टेज में शून्य से भी बहुत कम तापमान में द्रवीकृत होने वाले क्रायोजेनिक प्रोपेलेंट का इस्तेमाल होता है। ये प्रोपेलेंट हैं शून्य से 250 डिग्री सेल्यिस नीचे द्रवित हाइड्रोजन और शून्य से 196 डिग्री सेल्सियस नीचे द्रवित ऑक्सीजन।
इन प्रोपेलेंट को टैंक से निकालने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले टबरे पंप प्रति मिनट 42,000 चक्कर लगाते हैं। इसके अलावा क्रायोजेनिक तापमान पर काम करने के लिए विशेष प्रकार की सामग्री का इस्तेमाल होता है।
कुल मिलाकर यह बेहद जटिल और नाजुक परीक्षण है जिसकी प्रक्रिया अक्टूबर 2006 में पहले आंशिक परीक्षण से शुरू हुई थी। यह देखते हुए कि इसी साल जनवरी में अगले चरण के परीक्षण के दौरान ऑनबोर्ड एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर के दो सेंसरों की रीडिंग में गड़बड़ी आने के कारण उसे बीच में रोक देना पड़ा था, नई उपलब्धि का महत्व और बढ़ जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की ताजा उपलब्धि हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयां देगी।