आलेख.
नासा के वैज्ञानिकों की यह घोषणा कि उन्होंने हमारी सौर प्रणाली की ही तरह एक और सौर प्रणाली की खोज की है, खगोलविज्ञान की एक प्राचीन जिज्ञासा की पूर्ति करती है। बच्चे अब स्कूल में सीखेंगे कि खगोलविज्ञानी एक नहीं बल्कि अधिक ग्रह प्रणालियों के बारे में जानते हैं, जिनमें से कुछ हमारे ब्रrांड के दालान में पड़ी हुई हैं।
एक तरह से यह खोज उस क्रांति की निरंतरता है जिसका सूत्रपात कोपरनिकस, केल्पर और गैलीलियो ने किया था, जिसके मुताबिक पृथ्वी और बाद में सूर्य ने भी ब्रrांड के केंद्र के रूप में अपना खास स्थान गंवा दिया था।
नासा वैज्ञानिकों ने 55 कैंकरी के आसपास पांच ग्रह खोजे हैं। कैंकरी सूर्य जैसा ग्रह है जो कर्क (कैंसर) के तारामंडल में 41 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इनमें से एक ग्रह कथित ‘आवासयोग्य क्षेत्र’ उस क्षेत्र में स्थित है जहां का तापमान जीवन के अनुकूल है। खगोलविज्ञानियों का अंदाज है कि यहां ऐसे चंद्रमा हो सकते हैं जिनमें पृथ्वी की तरह खूबियां हों।
एक बहुत पुराने विचार को यह खोज आधार देती है जिसके मुताबिक हमारी सौर प्रणाली में जिस प्रक्रिया से ग्रहों का उदय हुआ है वह विशिष्ट नहीं है और अन्य स्थानों पर भी ग्रह मौजूद हैं।
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में दार्शनिक एपिक्यूरस ने लिखा था, ‘हमारी इस दुनिया से मिलते-जुलते और इससे अलग असंख्य संसार हैं।’ 13वीं सदी में अल्बेरटस मैग्नस ने सवाल उठाया था ‘क्या कई संसारों का अस्तित्व है या सिर्फ एक ही दुनिया है?’ और वर्ष 1600 में गिओरडानो ब्रूनो को अपने इस कथन के लिए कड़ी सजा भुगतनी पड़ी थी कि ‘बेशुमार सूरज हैं और बेशुमार पृथ्वियां इन सूर्यो की परिक्रमा करती हैं।’
गैर सौरमंडलीय ग्रहों को ‘एक्जोप्लेनेट्स’ कहा जाता है। दार्शनिक इम्मैनुएल कैंट ने इनकी मौजूदगी पर जोर दिया था। 1755 में स्वर्ग सिद्धांत के माध्यम से कैंट ने इस विचार को आगे बढ़ाया था कि शनि के अलावा भी ग्रह सौर प्रणाली में हैं और यह ग्रह हमारी सौर प्रणाली तक सीमित नहीं हैं। उस समय तक केवल छह ही ग्रहों के बारे में जानकारी थी। उन्होंने लिखा था- ‘हमारी ग्रह प्रणाली के केंद्र में सूर्य है, और जो स्थिर सितारे हम देखते हैं, उनके किसी अन्य मिलती-जुलती प्रणाली के केंद्र में होने की संभावना है।’
कैंट की पहली भविष्यवाणी उनके जीते जी ही सिद्ध हो गई थी। 1781 में जर्मन संगीतकार और खगोलविज्ञानी विलियम हर्सशेल इंग्लैंड आ गए थे। एक दिन उन्हें एक धुंधली सी वस्तु नजर आई, जो शनि से परे ग्रह जैसी कक्षा में गतिशील थी। इसे यूरेनस (वरुण ग्रह) नाम दिया गया। इसके बाद तो ग्रह की खोज के लिए उत्साह काफी बढ़ गया।
शौकिया खगोलविज्ञानियों ने रात के आकाश पर अपने टेलीस्कोप गड़ा दिए, इस उम्मीद में कि शायद उन्हें भी कोई नया ग्रह दिख जाए। सिर्फ अपनी ही सौर प्रणाली के ग्रहों की सूची बनाना जहां मुश्किल था, वहीं इससे बाहर ग्रहों की खोज तो और भी जटिल काम था। सितारों के बीच की दूरी मीलों में नहीं बल्कि प्रकाश वर्ष में मापी जाती है। एक प्रकाश वर्ष लगभग छह पद्म (ट्रिलियन) मील के बराबर होता है।
जो ग्रह नजदीकी सितारों के आसपास कुछ ही प्रकाश वर्ष की दूरी पर होते हैं, वे भी काफी धुंधले होते हैं। ग्रह स्वयं अपना कोई प्रकाश उत्पन्न नहीं करते, बल्कि अपने मूल सूर्य की रोशनी से दमकते हैं। एक सितारे से दूसरे के बीच के खाली स्थान की यात्रा से प्रतिबिंबित प्रकाश इतना धीमा पड़ जाता है कि ऐसे ग्रहों की तस्वीर लेना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
सौर प्रणाली के बाहर किसी ग्रह की खोज पहली बार 1995 में की गई थी। ज्यों-ज्यों टेलीस्कोप बेहतर होते गए, इस तरह के धुंधले एक्जोप्लानेट्स नजर में आए। कुछ मामलों में खोज अपरोक्ष रूप से हुई। 55 कैंकरी ग्रह का मामला भी ऐसा ही है। ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण से विचलन के कारण मूल ग्रह में हुई हरकत से इनका पता चला।
आज खगोलविज्ञानी नजदीकी सितारों के आसपास लगभग 260 एक्जोप्लेनेट्स की गिनती कर चुके हैं। सवाल यह पैदा होता है कि इनमें से कई ग्रह पृथ्वी जैसे हैं या नहीं। आखिरकार सूर्य एक साधारण सितारा है और आकाशगंगा में इसके जैसे लाखों सितारे हैं। यदि सूर्य जैसे सितारों के आसपास बृहस्पति और शनि जैसे ग्रह हैं, तो क्या यह सोचा नहीं जा सकता कि पृथ्वी जैसे ग्रह उनकी परिक्रमा कर रहे हैं?
नासा की घोषणा के चंद दिनों बाद खगोलविज्ञानियों ने सूर्य के पास इसका एक जुड़वा खोजा था। इसके आसपास बड़े ग्रह तो नहीं हैं मगर यह स्पष्ट नहीं है कि छोटे ग्रह मौजूद हैं या नहीं। पृथ्वी जैसे ग्रह की मौजूदगी के सीधे प्रमाणों की खोज के लिए शक्तिशाली टेलीस्कोप की एक नई पीढ़ी की दरकार होगी। मगर कामयाबी मिलने की पूरी उम्मीद है।
-लेखक खगोलविज्ञान तथा खगोलभौतिकी विषयों के जानकार हैं।