दृष्टिकोण.
कुछ दिन पहले तक गुजरात की पहचान अहिंसा के सिपाही महात्मा गांधी और मेहनतकश व्यापारियों की भूमि के रूप में थी। प्रदेश की छवि का यह अति सामान्यीकरण था मगर अब यह छवि कुछ ज्यादा ही जटिल हो गई है। हाल के दिनों में विकास की डगर पर सबसे तेज रफ्तार से बढ़ते भारतीय राज्य के नाते गुजरात एशियाई टाइगर के रूप में उभरा है।
वहां बेरोजगारी की दर सबसे कम है, निवेशकों के लिए सबसे अनुकूल माहौल है, लालफीताशाही और निचले स्तर पर भ्रष्टाचार भी नहीं के बराबर है। इसके अलावा 1991 के बाद वहां किसी भी दूसरे राज्य की तुलना में रोजगार के अवसर भी सबसे ज्यादा बढ़े हैं। इस वजह से बिहार और मध्यप्रदेश के प्रवासी मजदूर इसे संभावनाओं से भरपूर प्रदेश का नाम देने लगे हैं।
इसके बावजूद गुजरात देश का वह राज्य भी है जहां 2002 में दिन-दहाड़े नरसंहार हुआ था और इस नरसंहार के जिम्मेदार लोग चुनाव के जरिये सत्ता में पहुंचे थे। तहलका के हाल के खुलासे ने सत्ता में बैठे लोगों की नरसंहार में भूमिका की पुष्टि भी कर दी है। हालांकि राजनीतिकों के बड़े वर्ग ने इस खुलासे पर साजिश भरी खामोशी ओढ़ रखी है।
तहलका की रिपोर्ट तैयार करने वाले आशीष खेतान की हालत हस्तिनापुर के दरबारियों के बीच की द्रोपदी जैसी हो गई जिसका चीरहरण किए जाने के वक्त भीष्म समेत किसी ने भी चूं तक नहीं की थी। बीते पांच साल में गुजरात को लेकर हम खूब आरोप-प्रत्यारोप सुनते रहे हैं। आखिरकार खेतान ने सत्ता में बैठे लोगों की नरसंहार में मिलीभगत ठोस सुबूतों के साथ साबित कर दी।
जो लोग 2002 के गुजरात दंगों की तुलना 1947 के भारत विभाजन के दंगों से करते हैं वे गलत हैं। 1947 के दंगे अचानक भड़के थे और तब का शासन-तंत्र उन पर काबू पाने में नाकाम रहा था। गुजरात के मामले में शासन-तंत्र ने दंगों पर नियंत्रण तो नहीं ही किया, इसके उलट इनमें उसकी मिलीभगत भी रही।
अगले महीने गुजरात में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और मतदाताओं को फैसला करना है कि उन्हें राज्य में उस वास्तविक आर्थिक कायाकल्प के लिए नरेंद्र मोदी को पुरस्कृत करना है जो लाखों लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर ले आया है या उन्हें कोई वैसी ही विभाजक रेखा खींचनी है जैसी कि इमरजेंसी के बाद देश के मतदाताओं ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करके खींची थी।
क्या गुजरात के मतदाता 2002 के दंगों केलिए मोदी को इंदिरा गांधी जैसी ही सजा देंगे? यह गुजरात की दुविधा है और ख्यात अमेरिकी दार्शनिक मार्था नुसबॉम की नई पुस्तक ‘द क्लैश विदिन : डेमोक्रेसी, रिलीजस वायलेंस एंड इंडिया’ज फ्यूचर (परमानेंटब्लैक)’ हमें इस दुविधा को समझने में मदद देती है।
मार्था का तर्क है 9/11 के बाद की दुनिया में हिंसक इस्लाम और अमेरिका, यूरोप तथा भारत की शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच सभ्यताओं के बीच दंतकथाओं जैसा टकराव (यह अवधारणा सैमुएल हटिंगटन ने दी है) जैसा कुछ नहीं है। यह वस्तुत: हम में से प्रत्येक के मन में चल रहा द्वंद्व है क्योंकि मानव होने के नाते हम हमेशा अपनी सुरक्षा के लिए आक्रामक रवैया अपनाने और सबके साथ मिलकर रहने की अपनी क्षमता के बीच झूलते रहते हैं।
मार्था का तर्क है कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं और हरेक देश में दोनों तरह के लोग मिल सकते हैं। पहली तरह के लोग (मेरी राय में जिनकी संख्या ज्यादा है) आत्मविश्वास से भरपूर होते हैं और महात्मा गांधी की तरह ऐसे लोगों को अपने से भिन्न लोगों से किसी तरह का भय नहीं होता है। ऐसे लोग अपने से भिन्न लोगों को सम्मान देते हैं और उन्हें आगे बढ़ने देने में खुशी का अनुभव करते हैं। इस तरह के आत्मविश्वासी लोग अपने जीवन की राह खुद बनाते हैं।
दूसरी तरह के लोग मोदी जैसे होते हैं जो धार्मिक भिन्नता और बहुलतावादी समाज व्यवस्था से खौफ खाते हैं। वे अल्पसंख्यकों को कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा मानते हैं और उन्हें नियंत्रित करने की चिंता में डूबे रहते हैं।
अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की कांग्रेस की नीतियों ने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में दूसरी तरह के लोगों के बढ़ने के लिए बहुत अवसर सृजित किए हैं। गुजरात में मोहम्मद गजनी की यादों की जड़ें भी बहुत गहरी हैं। महात्मा गांधी का उदाहरण भी इन जड़ों को कमजोर नहीं कर पाया। दूसरी तरह के इन लोगों का आचार-व्यवहार बेहद गैरभारतीय है।
हालांकि तमाम विविधताओं से भरे बहुलतावादी समाज में ऐसे लोगों की स्वीकार्यता ज्यादा दिन नहीं रहने वाली है। भारत के लोग आज भविष्य की ओर देखना चाहते हैं। अतीत में जाकर गजनी को देखने के लिए न तो उनके पास समय है और न ही यह उनकी प्राथमिकता में शुमार है।
इस तरह हम पाते हैं कि गुजरात के आने वाले चुनावों में हम में से हरेक के मन का द्वंद्व दांव पर लगा है। अपने से भिन्न लोगों के बारे में हमारी धारणा इस द्वंद्व को किसी फैसले में तब्दील करती है। राजनीति हमें एक तरफ या फिर दूसरी तरफ झुकने को मजबूर करती है-गुजरात शाइनिंग की तरफ या फिर गुजरात व्हिनिंग की तरफ।
हकीकत है कि एक तरफ गुजरात समृद्धि के पायदान चढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ नरसंहार का कलंक भी ढो रहा है। एक तरफ लोग गुजरात को समृद्ध होते देखना चाहते हैं तो दूसरी तरफ वे अपनी पहचान सभ्य समाज के रूप में भी चाहते हैं। आर्थिक विकास कितना भी क्यों न हो, नरसंहार का धब्बा मिट नहीं सकता है। ऐसे में यह कहना आसान है कि मोदी को हटा देना चाहिए लेकिन अभी-अभी गरीबी रेखा से ऊपर उठे नागरिक के लिए यह फैसला करना इतना सहज भी नहीं है।
आदर्श स्थिति तो यह होती कि नरसंहार के दोषी लोगों को सत्ता से बेदखल कर दिया जाता और उनकी अच्छी नीतियों को जारी रखा जाता लेकिन कोई इस बात पर भरोसा नहीं कर सकता है कि कांग्रेस या फिर दूसरी कोई पार्टी या नेता मोदी के अच्छे काम को जारी रख सकते हैं। गुजरात के लोगों की दुखमय दुविधा यही है।
-लेखक प्रॉक्टर एंड गैंबल इंडिया के सीएमडी रहे हैं।