उदयपुर. फूलों की कुछ किस्मों की खेती के लिए राजस्थान की जलवायु श्रेष्ठ है। यहां की जलवायु में गेंदे के फूल की सफल खेती की जा सकती है। किसान गेंदे की खेती कर अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं।
यह बात राजस्थान कृषि महाविद्यालय में चल रही समन्वित पुष्प परियोजना की राष्ट्रीय कार्यशाला में आरसीए के उद्यानिकी विभागाध्यक्ष डॉ. आर.ए. कौशिक ने गेंदा फूल की खेती संबंधी सत्र में कही। उन्होंने कहा कि कृषि महाविद्यालय में गेंदे पर अनुसंधान पर विशेष जोर दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि क्षेत्र के किसानों को निकट समय में आईसीएआर द्वारा विकसित पूसा नारंगी गेंदा व पूसा बसंती गेंदा फूल के पौधे खेती के लिए एमपीयूएटी के पुष्प अनुसंधान केंद्र के माध्यम से उपलब्ध कराए जाएंगे। उन्होंने कहा कि गेंदे की खेती के लिए शरद ऋतु उपयुक्त समय होता है।
तोड़ने के बाद कई दिनों तक महकते रह सकते हैं फूल
फूलों की तुड़ाई पश्चात प्रबंधन संबंधी सत्र में डॉ. आर.ए. कौशिक ने बताया कि रजनीगंधा व ग्लेडियोलस के फूलों को तोड़ने के बाद पानी में न रखकर यदि 4 प्रतिशत सुक्रोज, केल्शियम हाइपोक्लो क्लोराइड तथा 50 पीपीएम क्लोरीन के घोल में डूबोकर रखा जाए तो उन्हें कई दिनों तक तरोताजा रखा जा सकता है। यह तकनीक फूलों से होने वाली आय में वृद्धिकारक है।
इसके बाद हुए फसल प्रबंधन सत्र में डॉ. के.सी. पुंडरिक ने कहा कि गेंदा में अब तक पौधे तैयार करने के लिए बीज का उपयोग किया जाता रहा है। इससे पौधों में विभिन्नता आने की संभावना रहती है। वैज्ञानिकों ने इस समस्या से निजात पा ली है। नई तकनीक से अब गेंदे की मुलायम शाखाओं को कटिंग कर उन्हें पौध के रूप में उगाया जा सकता है। इन पौधों में मातृ पौधों के जैसे ही गुण होते हैं। राजस्थान में गेंदे की खेती संभावनाओं को देखते हुए यह अनुसंधान क्रांतिकारी सिद्ध हो सकता है।
जनन द्रव्य उन्नयन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ. स्वामीनाथन अनुसंधान फाउंडेशन के पूर्व परियोजना निदेशक डॉ. पी. दास ने कहा कि अब परंपरागत अनुसंधान से हटकर जैव तकनीक पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। भारत में पाए जाने वाले फूलों की प्रजातियों जीन मेपिंग की जानी चाहिए। फूलों की जैव विविधता के लिहाज से भारत संपन्न राष्ट्र है। फलों की गुणवत्ता युक्त प्रजातियों को संरक्षित कर इनके जीन को विकसित किया जाना चाहिए।