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सुरुज चले भिनुसार..

बिलासपुर.pooja ‘सात घोड़वा के रथ चढ़के सुरुज चले भिनुसार, दुअरिया छठ मइया के..’, ‘सकल जगतारिन हो छठी मैया’ एवं अन्य पारंपरिक गीतों के साथ संस्कारधानी में तालाबों के किनारे जुटे हजारों श्रद्धालुओं ने अस्ताचल को जा रहे सूर्य को अध्र्य दिया। बिहार व उत्तरप्रदेश में श्रद्धा के साथ मनाए जाने वाले छठ पर्व पर बिलासपुर में भी श्रद्धा का सैलाब उमड़ा।

शहर में अरपा किनारे छठघाट सहित दर्जन भर तालाबों में दोपहर बाद से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। इससे पहले लोगों ने घरों में कोसी पूजा की। छठव्रती पूजन सामग्री से सजा हुआ दवरा सिर पर लेकर नंगे पांव छठघाट पहुंचे, जिसमें गेहूं के आटे से बने ठेकुआ के साथ नारियल, नींबू, सेब, अदरक, दीप सहित अन्य पूजन सामग्री थी।

chatपरिवार के पुरुष सिर पर दउरा रखकर अगुवा बनें और महिलाएं छठगीत गाते हुए पीछे चलीं। ज्यादातर लोग घाट तक पैदल ही पहुंचे, वाहनों में आने वालों की संख्या सीमित रही। राजकिशोर नगर, तोरवा, रेलवे परिक्षेत्र, मंगला, टिकरापारा, डीपूपारा, देवरीखुर्द, विद्यानगर, तारबाहर व शहर के विभिन्न हिस्सों के अलावा ग्राम मोपका से भी सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु सूर्य को अध्र्य देने के लिए पहुंचे। यहां शाम सात बजे तक श्रद्धालुओं की कतार लगी रही।

शाम पांच बजे घाट पर नदी किनारे के लिए बड़ी संख्या में बनाई गई वेदियां में परंपरा अनुसार पूजा शुरू की गई। श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण यहां बनाई गई वेदियां कम पड़ गईं। एक वेदी पर सात से आठ परिवारों ने पूजा की। सूर्य को अध्र्य देने के साथ छठघाट पर जमकर आतिशबाजी की गई। लोगों ने एक दूसरे को छठ की शुभकामनाएं दी। आज दोपहर से रात घिरने तक पुल के आसपास छठव्रतियों का मेला लगा रहा। कई लोग तो यहां घूमने आए थे। चाट और आइसक्रीम के ठेले, खिलौने गुब्बारे तथा पटाखों की दुकानें लगीं। इनमें भीड़ भी रही।

घर से घाट तक गीतों की गूंज:
छठपर्व की सभी रस्में पारंपरिक लोकगीतों के साथ पूरी की गईं। घर में कोसी पूजा से शुरू हुए गीत नदी तक तक के सफर में जारी रहा। वेदी पूजा व सूर्य को अध्र्य देने के दौरान भी गीत गाए गए। व्रतियों का नाम जोड़कर गाए जाने वाले इन गीतों में छठ माता से परिवार की सुख, स्वास्थ्य व समृद्धि की कामना की गई। अनेक परिवार बैंड बाजे व ढोल-ताशे के साथ घाट पहुंचे।

लोटते हुए घाट पहुंचे श्रद्धालु:
छठ मइया की आराधना करने के लिए महिलाओं समेत कुछ श्रद्धालु जमीन पर लोटते हुए घाट तक पहुंचे। यहां उन्होंने सूर्य को पहला अध्र्य दिया। मन्नत पूरी होने या मन्नत मांगने के लिए ऐसा किया जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मेन रोड से छठघाट के किनारे तक कारपेट बिछाया गया था।

छठपूजा करने पहुंची राजकिशोर नगर निवासी श्रद्धा देवी ने बताया कि परिवार की खुशहाली के लिए वे कई वर्षो से छठ का व्रत रख रही हैं। इससे मन को शांति मिलती है। इसी तरह मसानगंज की श्रीमती कमला वर्मा, कृष्ण कुमार, शिखा, ओम, अंकिता व आस्था वर्मा ने भी छठ का उपवास रखा।

36 घंटे के उपवास की पारणा आज:
छठपर्व पर छठव्रतियों द्वारा गुरुवार से शुरू किए गए 36 घंटे के उपवास की पारणा शनिवार को सुबह अध्र्य देने के बाद की जाएगी। सूर्य को अध्र्य देने के बाद वे गेहूं आटे से बने ठेकुआ व प्रसाद में चढ़ाए गए फल ग्रहण करेंगे। इसके बाद घर जाकर भोजन किया जाएगा।

पत्रिका विमोचित:
छठपर्व की महिमा पर पाटलिपुत्रा संस्कृति विकास मंच द्वारा प्रकाशित पत्रिका का विमोचन विधानसभा उपाध्यक्ष बद्रीधर दीवान ने किया। इस मौके पर महापौर अशोक पिंगले, पूर्व बीडीए अध्यक्ष अनिल टाह सहित आयोजन समिति के संरक्षक एसपी सिंह, विजय प्रताप सिंह, अध्यक्ष सुनील सिंह, बीएन झा आदि उपस्थित थे।

सूबों की सीमाएं लांघ गया है पर्व:
छठ त्योहार बिहार का है और उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है, लेकिन अब यह प्रदेश की सीमाएं लांघ चुका है। छठघाट पर छलकते जनसमुद्र को देखकर यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता था कि घर से बाहर निकले बिहार के लोग छठ पर घर वापस जाने के बजाय अब अपने शहर में छठ मनाना ज्यादा पसंद करने लगे हैं।

बदबू से हलाकान हुए लोग:
छठपर्व उमंग, उत्साह और आराधना के साथ-साथ अपनी शुद्धता के नाम से भी जाना जाता है। छठव्रती शुद्ध होकर छठघाट तक पहुंचे, लेकिन तोरवा पुल के पास पसरी गंदगी और बदबू ने उन्हें हलाकान कर दिया। शाम को अध्र्य के समय ही पुल के पास सफाई के नाम पर कचरे में आग लगा दी गई थी, उड़ रहे धुएं और बदबू के कारण लोग वहां से आंख, नाक पर कपड़े ढंककर गुजरे।

सुबह 6.18 बजे दूसरा अध्र्य
अध्र्य देने के बाद शाम को घाट से वापस घर लौटकर घर के आंगन में कोशी भरी गई, जिसमें मिट्टी के दीपक के चारों ओर 7 या 9 गन्ने सजाए गए और विधि-विधान से कोशी की पूजा-अर्चना की गई। देर रात तक छठव्रती कोशी के चारों ओर बैठकर छठ माता व सूर्य की आराधना में लीन रहे।

रात के तीसरे पहर में घाट में कोशी का विसर्जन किया गया। छठ के दूसरे दिन सप्तमी की सुबह 6.18 बजे उगते हुए सूरज को अध्र्य दिया गया। छठघाट में सुबह 4 बजे से लोग पहुंचने लगे थे।





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