नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने प्रॉपर्टी खरीदने वालों पर व्यापक असर डालने वाले एक फैसले में अहम व्यवस्था देते हुए कहा है कि खरीदार को रजिस्ट्री के दिन प्रॉपर्टी के बाजार मूल्य के हिसाब से स्टांप ड्यूटी चुकानी होगी, चाहे संबंधित प्रॉपर्टी लंबे समय तक मुकदमेबाजी में उलझी क्यों न रही हो।
जस्टिस एके माथुर और जस्टिस मरकडेय काटजू की बेंच ने यह फैसला देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। बेंच ने टिप्पणी की कि यह सही है कि कोर्ट में लंबे समय तक मामले के लंबित होने का खामियाजा किसी को नहीं भुगतना चाहिए लेकिन इससे शुल्क ढांचे के सिद्धांतों की व्याख्या को बदला नहीं जा सकता।
क्या मामला था :
जयपुर के जैन खंडाका ज्वैलर्स ने 1991 में एक प्रॉपर्टी खरीदी और विक्रेता को 20,000 रुपए एडवांस दिए। उस वक्त प्रॉपर्टी की कुल कीमत 1,40,000 रुपए थी। एडवांस देने के बावजूद विक्रेता ने उसके दस्तावेज पेश नहीं किए। इस पर खंडाका ज्वैलर्स ने 1991 में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। फरवरी 1994 में निचली कोर्ट ने खरीदार के पक्ष में डिक्री दी। उसने कोर्ट के आदेश पर 40,000 रुपए भी जमा करा दिए, लेकिन इसके बावजूद विक्रेता ने बिक्री के दस्तावेज नहीं दिए। इसके बाद प्रॉपर्टी के रेट बढ़ जाने पर कलेक्टर ने अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी के आदेश जारी किए।
खंडाका ज्वैलर्स ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि स्टांप ड्यूटी का भुगतान सेल एग्रीमेंट की तारीख पर प्रॉपर्टी के मूल्य के हिसाब से किया जाए। आखिर खरीदार मुकदमे में लगे वक्त का दंड क्यों भुगते। इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि खंडाका ज्वैलर्स स्टांप ड्यूटी एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप कलेक्टर द्वारा निर्धारित स्टांप ड्यूटी और सरचार्ज का भुगतान करे।