इंदौर.
तीस साल बीत गए लेकिन यादों का पहिया वहीं ठहरा रह गया। इसके चलते वह शहर की उन गलियों में फिर आ पहुंची जहां भाई से
बिछड़ी थी। खड़िया गेट (अहमदाबाद) निवासी मीनाबेन तलशाह बारह साल की थीं तब माता-पिता के मौत के बाद भाई महेश ललवानी इंदौर से राजस्थान ले गए और बहन रोहिणी की ससुराल छोड़ आए थे। वहीं बड़ी हुई और ब्याह भी हो गया।
भाई से मिलने की इच्छा मन में दब गई और पति, ससुराल, बच्चों में उलझकर 25 साल बीत गए। अब पति दशरथ तालशाह ने साथ दिया और उनके साथ भाई को ढूंढते हुए यहां तक आ पहुंची।
उस समय कहां रहती थीं? यह पूछने परे वह चहककर कहती हैं पता तो याद नहीं लेकिन परदेशीपुरा में कहीं रहते थे। तब भइया 22-23 साल के रहे होंगे और रोलिंग मिल में काम करते थे। वे मुझे मुन्नी कहकर बुलाते थे।
वे बताती हैं यहां कोई रिश्तेदार नहीं है इसलिए धर्मशाला में ठहरे हैं। शनिवार को जो-जो गलियां और नाम याद आया वहां गई लेकिन उनका पता नहीं चला। ..पर मैं आस नहीं छोड़ूंगी।