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खून के सौदागर बेच रहे हैं मौत

बिलासपुर. blood देवकीनंदन चौक पर रोज खून बेचने वालों का जमावड़ा लगता है। पास ही स्थित एक नर्सिग होम में 140 रुपए की दर से खून खरीद लिया जाता है। खून बेचने वाले ये लोग रिक्शा चालक या मजदूर वर्ग के लोग हैं, जो शराब पीने या परिवार चलाने की मजबूरी की वजह से खून बेचने लगे हैं।

रुपए के लालच में ये हफ्ते में एक बार से लेकर महीने में दो से तीन बार तक खून बेचते हैं। पास के एक होटल का कर्मचारी भी इसमें दलाल की भूमिका निभाता है, जो नए-नए रिक्शा चालकों को खून बेचकर पैसा कमाना सिखाता है। एक खून बेचने वाले तालापारा के 35 वर्षीय शेख खलिक का कहना है कि पिछले कई सालों से वह खून बेचने का धंधा कर रहा है। पहले वह रिक्शा चलाता था।

इसी दौरान उसका संपर्क होटल के कर्मचारी से हुआ। खून बेचकर बिना मेहनत के ही 140 रुपए मिलने पर वह हफ्ते में दो बार तक खून बेच दिया करता था। धीरे-धीरे कमजोरी आने पर उसने रिक्शा चलाना छोड़ दिया, कमजोरी छिपाने के लिए उसने शराब पीना चालू कर दिया। अब शराब के लिए ही वह खून बेचने लगा है। इसी तरह तालापारा के नाले हैदर व गोंड़पारा के मुन्ना यादव का भी हाल हो चुका है।

नाले हैदर अब रिक्शा नहीं चला पाता और देवकीनंदन चौक के पास शराब दुकान के आसपास से शराब की खाली शीशी उठाता है। उसके बीवी-बच्चे दूसरों के घरों में काम करके गुजारा करते हैं, जबकि खून बेचकर निढाल हो चुके शरीर में जान लाने के लिए वह शराब पीता है। घर से रुपए नहीं मिलने के कारण वह खून बेचने को मजबूर है, जबकि नर्सिग होम संचालक गरीबों का खून चूसकर अमीर हो चुका है।

>> खून खरीदना या बिना जांच के ही खून को बेच देना कानूनन जुर्म है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर पाबंदी लगाई है। यदि किसी पैथोलैब या नर्सिग होम में खून की खरीद-फरोख्त हो रही है तो गलत है। सबूत मिलने पर स्वास्थ्य विभाग ड्रग्स एंड कास्मेटिक डिपार्टमेंट को रिपोर्ट भेज सकता है।
डा. आरआर तिवारी, सीएमओ

>> रक्तदान के बाद कम से कम तीन महीने का समय हीमोग्लोबिन के पुनर्निर्माण के लिए जरूरी होता है। मेहनतकश लोगों में हीमोग्लोबिन अधिक रहता है, इसलिए वे कम समय में भी पुन: खून निकलवा सकते हैं, लेकिन यह घातक हो सकता है।
डा. अशोक मेहता, शिशु रोग विशेषज्ञ

>> रक्तदान करने पर रक्त के कण (आरबीसी) बाहर जाता है। तीन महीने के समय में यह फिर से बनता है। बार-बार रक्तदान करने से लाल रंग का द्रव बाहर जाता है, जिसमें रक्तकणों कम रहते हैं। यह मरीज के लिए फायदेमंद भी नहीं हो सकता।
डा. पंकज टेंभुर्णिकर, सिम्स

इनका क्या होगा
नर्सिग होम में बिना जांच के ही रिक्शा चालकों का खून खरीद लिया जाता है। इसके बाद इसे बिना जांच के ही रख लिया जाता है। यहां के कर्मचारियों के संबंध अन्य नर्सिग होम या प्राइवेट हास्पिटल के कर्मचारियों से है।

जब किसी को आपातकाल में खून की जरूरत होती है तो वे ऊंचे दाम पर खून खरीद लेते हैं। फिर उस खून को मरीज को चढ़ा दिया जाता है। रिक्शा चालकों के खून में यदि किसी बीमारी का संक्रमण हो तो इसका खामियाजा बाद में मरीजों को उठाना पड़ सकता है। ऐसे में ही एचआईवी के फैलने की भी आशंका रहती है।

कैसे आया मामला पकड़ में
देवकीनंदन चौक पर स्थित उक्त नर्सिग होम में खून बिकने की शिकायत काफी समय से थी। शनिवार की शाम आसपास के कुछ युवकों ने रिक्शा चालकों को नशे की हालत में बात करते सुना। इसके बाद उन्होंने उनसे विस्तृत चर्चा की तो यह बात सामने आई।

रिक्शा चालकों का कहना है कि रोज सुबह 15 से 20 व्यक्ति खून बेचते हैं। शेख खलिक के पास कुछ लोगों के मोबाइल नंबर भी हैं। रुपए की जरूरत पड़ने पर वह नंबरों पर संपर्क करता है और वहां खून निकलवा लेता है।





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