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Personal Finance Personal Finance मुंबई. प्रिंसीपल रिसर्जेट इंडिया इक्विटी फंड ने 15 नवंबर 2003 को खत्म साल में 147.11 फीसदी मुनाफा कमाया। उस समय की तमाम डाइवर्सिफाइड स्कीमों
में यह सबसे ऊपर था। अगले ही साल इसका रिटर्न 30.65 फीसदी पर और सूची में इसका नाम 39वें स्थान पर आ गया।
अक्सर फंड स्कीम बेचने वाले पिछले साल के कामकाज को ही दिखाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि इन स्कीमों का प्रदर्शन और नतीजे तेजी से बदलते हैं। ‘डीएनए मनी’ के विश्लेषण से पता लगता है कि 15 नवंबर 2003 के हिसाब से दस में से केवल तीन स्कीम ऐसी थीं, जो एक साल बाद भी सूची में जगह बरकरार रख सकीं। वहीं 15 नवंबर 2004 की टॉप टेन में से केवल पांच स्कीमें ऐसी थीं जो एक साल बाद जगह बनाए रख सकीं। बल्कि 2005 में तो दस में से एक ही स्कीम अपनी जगह कायम रख सकी थी।
अगर नवंबर 2006 में देखें तो दस में तीन स्कीमें ऐसी थीं, जो एक साल बाद अपनी जगह बरकरार रख सकीं। हुआ यह है कि टॉप टेन बनाने वाली स्कीमें अक्सर अगले साल की सूची से गायब हो जाती हैं। साफ है कि म्यूचुअल फंडों के एक साल के रिटर्न की रणनीति काम नहीं करती है। लेकिन जब किसी साल में कोई स्कीम अच्छा प्रदर्शन करती है तो उसी को दिखाकर धन बटोरा जाता है।
क्यों होता है ऐसा:
जब किसी स्कीम में निवेश की मात्रा बढ़ती है तो पूरे कामकाज पर एक शेयर का असर घट जाता है। यानी फंड मैनेजर को ऐसे मल्टी-बैगर शेयरों में धन लगाना होगा, जिनसे स्कीम लगातार अच्छा प्रदर्शन करे। यह संभव नहीं हो पाता है। मल्टी-बैगर शेयर वे हैं जिनकी संभावनाओं का पता बाजार को तब तक लगता नहीं है। ऐसा शेयर चुनने में जोखिम भी रहता है। जब किसी फंड में धन आता है तो फीस से होने वाली आय भी बढ़ जाती है। ऐसे में फंड मैनेजर जोखिम लेने से बचने लगता है।
कैसे करें चुनाव:
1. किसी स्कीम का 3-5 साल का प्रदर्शन देखें। जो स्कीम 3-5 साल तक सूची में स्थान बनाए रखती है, तो आगे भी बनाए रखेगी।
2. अगर 15 नवंबर 2006 के हिसाब से देखें तो टॉप टेन में से सात स्कीमें पांच साल में रिटर्न के हिसाब से अपनी जगह कायम रख पाईं।