अभिमत. अर्थव्यवस्था में तेजी आने के साथ देश के हवाई यातायात में भी अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है और साथ ही विभिन्न हवाईअड्डों पर तथा उड़ानों के दौरान अव्यवस्था और अफरातफरी का माहौल भी बढ़ा है। आए दिन किसी न किसी हवाईअड्डे से छोटी-मोटी दुर्घटना की खबर आना आम हो गया है।
कभी विमान रन-वे से फिसल जाता है, कभी हवाईअड्डों पर यात्रियों और सामान को लाने-ले जाने वाले वाहनों से टकरा जाता है और कभी आकाश में दो विमानों के टकराने की नौबत आ जाती है।
उड़ान भरते समय पक्षियों से टकराकर विमान का इंजन खराब होने की घटनाएं भी आम हैं। इस सबके अलावा विमान सेवाओं के कर्मचारियों की लेट-लतीफी, आंदोलन और घोषित-अघोषित हड़तालें भी यात्रियों की मुसीबतों को बढ़ाने में अपना योगदान देती हैं। इन हालात में अपने हवाईअड्डों और यात्रा सेवाओं को विश्वस्तरीय बनाने के हमारे सपने प्राय: बिखरते नजर आते हैं।
व्यावसायिक राजधानी मुंबई में बने नए टर्मिनल ने कुछ उम्मीदें जरूर बंधाई हैं मगर अन्यत्र हवाईअड्डों से लेकर उड़ानों तक में होने वाली अव्यवस्थाएं चिंताजनक रूप लेती जा रही हैं और इन्हें दूर करने के लिए जिस इच्छाशक्ति की जरूरत है वह सिरे से नदारद है। चूंकि हवाईअड्डे एक तरह से देश का प्रवेश द्वार भी होते हैं इसलिए उनमें होने वाली अव्यवस्थाएं विदेशी मेहमानों के सामने हमारी अच्छी छवि नहीं बनातीं।
समय का तकाजा है कि देश के हवाईअड्डों की अव्यवस्थाओं को पूरी तरह समाप्त किया जाए तथा हवाईयात्राओं को पूरी तरह निरापद बनाया जाए। इसके लिए नागरिक उड्डयन मंत्रालय और भारतीय हवाईअड्डा प्राधिकरण को स्थिति पर समग्रता से विचार करके इसमें सुधार के फौरी और दीर्घकालीन उपाय करने को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना चाहिए तथा हालात को बेकाबू होने देने की नौबत नहीं आने देना चाहिए।