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शीतलहर, गर्मी या भूकंप से मौत मतलब दुर्घटना मृत्यु

आलेख. death अगर एक 37 वर्षीय व्यक्ति की मौत शीतलहर के कारण हो जाए, और उसकी विधवा बीमा कंपनी से बीमे की रकम की मांग करे, तो उम्मीद यही होती है कि इंशूरेंस का पैसा मिल जाएगा। मगर परशुरामसिंह के मामले में बीमा कंपनी ने रकम देने से इंकार कर दिया।

दरअसल बीमा कंपनी ने दावे को इस आधार पर मंजूर नहीं किया कि शीतलहर से हुई मौत को दुर्घटना के कारण मृत्यु के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। स्व. परशुरामसिंह की पत्नी को और भी निराशा तब हुई जब जिला और राज्य स्तरीय उपभोक्ता अदालतों ने भी बीमा कंपनी के फैसले को सही ठहराया।

आखिरकार, देश की शीर्ष अदालत से परशुराम की पत्नी को राहत मिली जिसने बीमे की रकम, तीन लाख रुपए तथा 12 प्रतिशत की दर से ब्याज चुकाने का आदेश बीमा कंपनी को दिया। इस मामले में मूल मुद्दा यही था कि क्या शीतलहर से हुई मौत को दुर्घटनावश मृत्यु की श्रेणी में रखा जा सकता है? शीर्ष उपभोक्ता अदालत का सकारात्मक जवाब इस तरह के कई मामलों में नजीर साबित होगा।

परशुरामसिंह ने गोल्डन ट्रस्ट फाइनेंस सर्विस के गोल्डन मल्टी सर्विसेस क्लब के माध्यम से जनता एक्सीडेंस पॉलिसी खरीदी थी। पॉलिसी के तहत 1 जनवरी 2004 से 14 फरवरी 2006 तक दुर्घटना जोखिम के लिए बीमा कवर किया गया था। 1 जनवरी 2004 को परशुरामसिंह की मौत हो गई।

मृत्यु का कारण उस वक्त बिहार में जारी शीतलहर सामने आया जिस वजह से कई लोग मारे गए थे। मामला जब शीर्ष उपभोक्ता अदालत में पहुंचा, तो वहां इसी तरह के केस में पटना हाई कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों तथा इंग्लैंड के हाल्सबरीज कानून का परीक्षण किया गया। अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि प्राकृतिक तत्वों की चपेट में आने से हुई मौत को दुर्घटनावश मृत्यु माना जाए।

अपने तर्कपूर्ण फैसले में नेशनल कंज्यूमर डिसप्यूट्स र्रिडेसल कमीशन के अध्यक्ष एमबी शाह और सदस्य राज्यलक्ष्मी राव ने उल्लेख किया कि दुर्घटना शब्द का अर्थ कुछ अनपेक्षित होने से है, जैसे कोई अप्रत्याशित घटना। मगर जो अनपेक्षित है उसकी परख यह है कि क्या कोई सामान्य बुद्धिवान व्यक्ति ऐसी घटना की अपेक्षा कर सकता था। कमीशन ने कहा- इस देश और विदेशों में विकसित कानूनों से यह स्पष्ट है कि बिजली गिरने, धूप की मार या भूकंप के कारण पहुंची चोट या होने वाली मृत्यु को दुर्घटनावश ही माना जाता है।

यदि अपना काम करते हुए कोई व्यक्ति बायलर से निकलने वाली अत्यधिक गर्मी की चपेट में आ जाता है और उसकी मौत हो जाती है, तो इसे दुर्घटना से हुई मृत्यु माना जाएगा। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति बर्फीले सर्द पानी पर काम कर रहा है जिससे उसे न्यूमोनिया हो जाता है, और बाद में उसकी मौत हो जाती है, तो इस तरह की मौत को भी दुर्घटना मृत्यु माना जाएगा।

इसी प्रकार यदि बीमित व्यक्ति को मिर्गी का दौरा आ जाए, और वह ट्रेन के सामने आ जाए या गिर जाए तो यह बाहरी कारणों से होने वाली मौत होगी। इस तरह की मौत को भी दुर्घटना मृत्यु माना जाएगा। अपराधियों द्वारा दी गई धमकी के कारण होने वाली मृत्यु भी बाहरी, हिंसक और नजर आने वाले कारणों के चलते इसी श्रेणी में रखी जाएगी।

संक्षेप में, ऐसी मौत को दुर्घटना के कारण हुई मौत माना जाएगा जो घटनाओं की सामान्य अथवा प्राकृतिक प्रक्रिया में न हो, जो तर्कपूर्ण तरीके से अपेक्षित न हो। शीतलहर के कारण होने वाली मौत सामान्य मौत नहीं है इसलिए इसे दुर्घटना मृत्यु माना जाएगा क्योंकि सभी लोगों पर इसका एक जैसा असर नहीं होता और इसका कारण बाहरी प्राकृतिक हिंसक बल है। मौजूदा मामले में शीतलहर अचानक आई थी, जिसकी वजह से याचिकाकर्ता के पति सहित कई लोगों को गंभीर हृदयाघात आया और उनकी मौत हो गई।

अंत में, शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने नेशनल इंशूरेंस कंपनी को तीन लाख रुपए बीमा राशि सहित दुर्घटना मृत्यु की तारीख से छह माह तक का ब्याज 12 फीसदी की दर से चुकाने का आदेश दिया। मुकदमे की लागत 10 हजार रुपए भी अदा करने का आदेश अदालत ने दिया।

इस मामले में अदालत ने गोल्डन ट्रस्ट फाइनेंस सर्विसेस को भी 10 हजार रुपए अतिरिक्त खर्च के रूप में याचिकाकर्ता को चुकाने का आदेश दिया, क्योंकि उसने बीमा कंपनी से दावा राशि दिलाने में याचिकाकर्ता की कोई मदद नहीं की।

इस तरह अदालत ने सभी बीमा एजेंटों और मध्यस्थों को यह संकेत दिया कि यदि उन्होंने सेवा देने में चूक की तो वे भी हर्जाना चुकाने के भागीदार होंगे। (रीतादेवी बनाम नेशनल इंशुरेंस एवं अन्य। 2007 की पुनरीक्षण याचिका क्रमांक 973 फैसले की तारीख 24 अक्टूबर 2007)

-लेखिका उपभोक्ता मामलों की जानकार हैं।





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