दृष्टिकोण.
वरिष्ठ पत्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी युवा पत्रकारों को नसीहत देते रहे हैं कि जहां कहीं खून नजर आता है, खबर भी वहीं होती है। खून कैसे भी बहे-हिंसा में, दुर्घटना में, युद्ध में-खबर होता है और उसके बहने का पैमाना जितना बड़ा होता है, खबर भी उतनी ही बड़ी होती है। इस वजह से आम धारणा रही है कि अखबार खूनखराबा पसंद करते हैं क्योंकि खूनखराबे की खबरें उनकी बिक्री बढ़ाने में मदद करती हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों से जानकारी लेने और फोटो खींचने के लिए किसी भी अपराध स्थल पर रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों की भीड़ जुटने के दृश्य आम हैं। पत्रकारों की छवि कुछ ऐसी ही बन गई कि वे दिन की रोशनी में चैन से नहीं बैठ सकते हैं और कोई भी ‘अच्छी खबर’ उन्हें सुहाती नहीं है। मैं जब रिपोर्टिग करता था तब मुझ से यह सवाल अक्सर पूछा जाता था कि आप लोग बुरी खबरों के पीछे लट्ठ लेकर क्यों घूमा करते हैं।
लोगों को यह बताने और समझाने का कोई अर्थ नहीं है कि खबर का मतलब कुछ असामान्य होना ही है और इसके जरिये लोगों को किसी अनहोनी की जानकारी दी जाती है। लोग तो यहां तक मानते रहे हैं कि खून पत्रकारों के सिर पर चढ़कर बोलता है और जिस तरह चमगादड़ को सूरज की रोशनी बर्दाश्त नहीं होती वैसे ही पत्रकारों को भी अच्छी बातें बर्दाश्त नहीं होती हैं।
बुरी खबरों से बुरी तरह ऊबे एक व्यक्ति ने कुछ अलग करने की ठानी है। हमारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने ‘बिलियन बीट्स-पल्स ऑफ इंडिया’ नामक एक ई-पेपर की शुरुआत की है। कलाम के इस ई-पेपर में लोगों, खासकर 25 साल से कम उम्र के युवाओं को प्रेरणा देने वाली सफलता की कहानियों को प्रमुखता दी जाएगी। इस ई-पेपर के पहले अंक में युवाओं को पृथ्वी पर, उसके नीचे और उसके ऊपर सबसे शक्तिशाली संसाधन बताया गया है।
कलाम अपनी भूमिका में लिखते हैं,‘हमारे पास सभी गतिविधियों में सफलता के मोती भरे पड़े हैं। हमें इन्हें पिरोकर माला का रूप देना चाहिए।’ इस ई-पेपर की शुरुआत करने के पहले कलाम ने बहुत से लोगों से चर्चा की और इस नतीजे पर पहुंचे कि मीडिया में भूले-बिसरे नायकों का समुचित उल्लेख नहीं किया जाता है। उसमेंं राजनीति, हत्या और जाति युद्ध की खबरों का ही बोलबाला रहता है।
हालांकि एक व्यक्ति ने उनसे यह तक कहा कि आजकल राजनीति, हत्या और जाति युद्ध तीनों एक ही बात हो गए हैं। बहरहाल, कलाम का मानना है कि मीडिया की खबरों में नकारात्मकता भरी पड़ी है और ऐसी बातों का सर्वथा अभाव है जिनसे प्रेरणा मिलती हो और जिनका अनुकरण किया जा सकता हो।
लोगों को वही नजर आता है जो वे देखना चाहते हैं इसलिए यदि कलाम और उन सरीखे लोगों की राय में अखबारों में हिंसा की खबरें बहुत ज्यादा होती हैं तो एक दूसरे वर्ग के लोग कहते हैं कि मीडिया कड़वी सचाई का बयान नहीं करता है और ग्लैमर की दुनिया की खबरें ही परोसता है।
कुछ लोग कहते हैं कि अखबारों में पेज-3 का मसाला खूब होता है मगर देश की वास्तविक समस्याओं, जैसे कि किसानों की आत्महत्याओं का समुचित जिक्र नहीं होता है। आज आप कोई भी अखबार खोल कर देखें तो उसमें नव-कुबेरों, शेयर बाजार की छलांग, वैश्विक स्तर पर भारतीयों के बढ़ते दबदबे या भारतीय क्रिकेट टीम की जीत से संबंधित खबरों की भरमार मिल जाएगी।
इन खबरों को देखने-पढ़ने से लगेगा कि देश के लोग जोश से सराबोर हैं और सफलताएं उनके चरण चूम रही हैं। भारत में सब कुछ सकारात्मक हो रहा है और वह तेजी से वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बनाने में लगा है। देश के मध्य वर्ग को यह सब कुछ ज्यादा ही रास आता है।
भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग लंबे समय से देश के मध्य वर्ग की बात करता आया है। हमारा विशाल मध्य वर्ग समृद्धि के सोपान तो तेजी से चढ़ रहा है मगर पर्याप्त सुरुचि संपन्न नहीं हुआ है। यह वर्ग उपभोक्तावादी क्रांति में भरपूर योगदान कर रहा है जिसकी वजह से देश की अर्थव्यवस्था में भी खासी तेजी आ रही है। इस वर्ग को लोगों के जीवन मूल्यों के बारे में कमोबेश कोई अध्ययन नहीं हुए हैं और संभवत: अधकचरी धारणाएं बना ली गई हैं, फिर भी ओपीनियन मेकर इन्हें ही लेकर चिंता की मुद्रा अपनाएं हैं।
इस वजह से यदि कुछ लोग मानते हैं कि पाठक सफलताओं का ब्योरा देनेवाली केवल अच्छी खबरें चाहते हैं तो कुछ अन्य सोचते हैं कि उन्हें नसीहत दी जानी चाहिए। पत्रकार प्राय: इस भूल-भुलैया में उलझ जाते हैं। वे रणनीति बनाकर बाजार को खुश रखने की जुगत करते हैं और ऐसी खबरें गढ़ते-रचते हैं जो न तो ज्यादा चुनौतीपूर्ण हों और न ही किसी के प्रति ज्यादा आक्रामक हों।
समाज में हैसियत रखने वाले लोगों को सर-माथे बैठाया जाता है और आम लोगों को बलाए ताक रख दिया जाता है। इसके विपरीत राय रखने वालों का कहना है कि सफलता के जश्न हमारा ध्यान देश की मूलभूत समस्याओं से हटा देते हैं और हम असली देश को भी भूलने लगते हैं।
सचाई इस सबके बीच में झूलती है। अखबार एक डिपार्टमेंटल स्टोर की तरह होता है जिसमें हर किसी के लिए कुछ न कुछ सामान उपलब्ध रहता है। अपने समय को प्रतिबिंबित करना उसकी सर्वप्रमुख जिम्मेदारी है। भारत आज जिस दौर में है वैसा दौर दशकों से देखने को नहीं मिला है। अगर हमारे सामने समस्याओं के पहाड़ मुंह बाए खड़े हैं तो उपलब्धियों के शिखर भी नई उंचाइयां चूम रहे हैं।
बहु-निंदित पेज-3 आज के दौर की हमारी हकीकत है। पाठक इतना समझदार है कि वह जानता की है कि सामने परोसी गई अखबार रूपी थाली में से उसे क्या खाना है और क्या नहीं। वह पुराने दौर की पत्रकारिता तो पंसद करता है पर समयातीत और अप्रासंगिक हो चुके विचार उन्हें रास नहीं आते। वह अपना मनोरंजन चाहता है तो यह भी चाहता है कि उसे गंभीरता से लिया जाए और उसे चुनौतियां दी जाएं। वे खबरों को अच्छी या बुरी नहीं मानते। वे यदि धन कुबेरों के बारे में पढ़ना पसंद करते हैं तो खून बहने से जुड़ी खबरें रुचि के साथ पढ़ते हैं।