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यह तो होना ही था

सम्पादकीय. आखिर कर्नाटक में वही हुआ जिसका अंदेशा भारतीय जनता पार्टी के बीएस येदुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने के समय से ही जताया जा रहा था। जनता दल-एस के सर्वेसर्वा एचडी देवेगौडा के अड़ियल रवैये के चलते येदुरप्पा ने शपथग्रहण के ठीक एक सप्ताह बाद और विधानसभा में शक्ति परीक्षण के पहले ही इस्तीफा दे दिया।

बिना शर्त समर्थन की घोषणा करने वाले देवेगौडा ने येदुरुप्पा सरकार को समर्थन देने के लिए शर्तो का जो पुलिंदा पेश किया उसे न तो येदुरप्पा स्वीकार कर सकते थे और न उनकी पार्टी भाजपा ही। शर्तो से बंधी मजबूर या कठपुतली सरकार चलाने की बजाय इस्तीफा देना ही येदुरप्पा के सामने बेहतर विकल्प था।

कर्नाटक की राजनीति में एक माह से भी ज्यादा लंबे खिंचे इस नाटक में देवेगौडा कुटिल खलनायक के रूप में उभरे हैं। पहले कांग्रेस और फिर भाजपा को धोखा देकर उन्होंने गठबंधन धर्म की सारी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है और खुद को पूरी तरह अविश्वसनीय बना लिया है। देश का प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति सत्ता की बंदरबांट के लिए इस हद तक गिर सकता है यह देखकर किसी भी लोकतंत्र प्रेमी का सिर शर्म से झुक सकता है।

भाजपा के नेताओं ने कल्पना भी नहीं की होगी कि दक्षिण के किसी राज्य में अपनी पहली सरकार बनने का उनका उत्साह इतनी जल्दी काफूर हो जाएगा। उन्हें अब अच्छी तरह समझ में आ गया होगा कि 21 माह पहले गठबंधन सरकार बनाने के लिए देवेगौडा के पुत्र कुमारस्वामी को समर्थन देकर उन्होंने कितनी बड़ी चूक की थी।

इसके लिए अब वे पछतावा ही कर सकते हैं मगर खुद राजनीतिक अवसरवाद से मुक्त होने का दावा नहीं कर सकते। दीगर है कि कि पार्टी सहानुभूति लहर पर सवार होकर चुनाव के जरिये सत्ता में वापसी के लिए आत्मविश्वास से लवरेज है। हालांकि ऐसा आत्मविश्वास कई बार मृग मरीचिका भी साबित होता है।

ताजा घटनाक्रम के मद्देनजर कर्नाटक में राजनीतिक अनिश्चितता विधानसभा के नए चुनाव कराकर ही दूर की जा सकती है। इसके लिए राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर को पहले विधानसभा भंग करने और राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करनी होगी। वे एक बार विधानसभा को निलंबित रखने की सिफारिश करने की चूक कर चुके हैं। उम्मीद है कि ऐसी चूक दोबारा नहीं करेंगे और राज्य के मतदाताओं को शीघ्र से शीघ्र अपनी पसंद की सरकार चुनने का मौका देंगे।





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