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पहली-दूसरी में होगी छत्तीसगढ़ी की पढ़ाई

रायपुर. विधानसभा में राजभाषा का बिल इसी सत्र में आएगा। इसके साथ ही राज्य शैक्षिक अनुसंधान परिषद(एससीईआरटी) के विशेषज्ञ प्राइमरी स्कूल से इसकी पढ़ाई की तैयारी में जुट गए हैं। विशेषज्ञों ने छत्तीसगढ़ी बोली पर रिसर्च और अध्ययन शुरु भी कर दिया है।

छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने के बाद यह तय है कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा और सबसे पहले कक्षा पहली और दूसरी में इसकी पढ़ाई होगी। इसका स्वरुप कैसा होगा और किस तरह से पढ़ाया जाएगा? यह अभी तय नहीं है। एससीईआरटी और शिक्षा विभाग के विशेषज्ञ फिलहाल इसीमसले पर माथापच्ची कर रहे हैं। एससीईआरटी में अभी तक जितने विशेषज्ञों के विचार आए हैं, उनमें अलग-अलग राय दी गई है।

विशेषज्ञों की एक जमात का विचार है कि सबसे पहले छत्तीसगढ़ी भाषा की वर्णमाला को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वर्णमाला के साथ-साथ शब्द निर्माण भी बच्चों को सिखाना चाहिए। ऐसे विशेषज्ञ भी हैं जो यह मानते हैं कि पाठ्यक्रम में वर्णमाला और शब्द निर्माण सिखाने से बात नहीं बनेगी।

उनकी राय है कि बच्चों को छत्तीसगढ़ी सिखाने के लिए छोटे-छोटे वाक्य पाठ्यक्रम में रखना बेहतर होगा। इससे बच्चे जल्दी और बेहतर छत्तीसगढ़ी सीख सकेंगे। शिक्षा विभाग के आला अफसर विशेषज्ञों के विचारों का अध्ययन कर रहे हैं।

सचिव नंद कुमार का कहना है कि हम शासकीय आदेश जारी होने का इंतजार कर रहे हैं। आदेश जारी होने के साथ शासन किस तरह के दिशा निर्देश देता है, उसी आधार पर राजभाष के पाठ्यक्रम की अंतिम रुपरेखा तैयार की जाएगी।

सचिव के मुताबिक राजभाषा के बारे में बरसों से विशेषज्ञ लिखते आ रहे हैं। इसे देवनागरी लिपि में लिखा जाएगा, इसलिए इस पर कोई विवाद नहीं है। छत्तीसगढ़ी का व्याकरण भी कई विशेषज्ञों ने तैयार किया है। शासन से औपचारिक आदेश जारी होने के बाद उन विशेषज्ञों से व्याकरण आमंत्रित किया जाएगा।

आसान नहीं है डगर :
छत्तीसगढ़ी राजभाषा को पाठ्यक्रम का स्वरुप देना विशेषज्ञों के लिए आसान नहीं है। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में ही छत्तीसगढ़ी के कई शब्द अलग हैं। सरगुजा में जो छत्तीसगढ़ी बोली जाती है, उसके कई शब्द रायपुर जिले के लोग जानते तक नहीं हैं। जगदलपुर में बस्तर सीमा के पास जो छत्तीसगढ़ी बोली जाती है उसके मायने सरगुजा में रहने वालों की समझ से परे है।

राजधानी की छत्तीसगढ़ी और कसडोल बिलाईगढ़ की छत्तीसगढ़ी में भी फर्क है। कुरुद और धमतरी में भी छत्तीसगढ़ी के कई शब्द अलग है। एससीईआरटी और राजीव गांधी शिक्षा मिशन ने छत्तीसगढ़ी वर्णमाला और शब्दों के माध्यम से कहानी लिखने के लिए जून में एक कार्यशाला आयोजित की थी।

उसमें रायपुर के अलावा रायगढ़, जशपुर, बस्तर और धमतरी से विशेषज्ञों को बुलाया गया था। उसी दौरान यह तथ्य सामने आए और कार्यशाला बिना किसी नतीजे के खत्म कर दी गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ी में अलग-अलग शब्द होने के कारण उसे पाठ्यक्रम का स्वरुप देने में खासी दिक्कत होगी। विशेषज्ञों के मुताबिक महाराष्ट्र में मराठी और पंजाब में पंजाबी जैसी बोलियां पूरे राज्य में एक जैसी ही बोली व लिखी जाती है। इसलिए वहां पाठ्यक्रम तैयार करने में दिक्कत नहीं हुई।

27 बोलियां हैं
छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के अलावा 27 बोलियां बोली जाती हैं। एससीईआरटी के सहायक प्राध्यापक एसके वर्मा ने इस पर गहन शोध किया है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी एससीईआरटी को सौंपी हैं। उनके अध्ययन के मुताबिक 27 बोलियों में 22 बोली तो बेहद बड़े समूहों में बोली जाती है। हैरानी की बात यह है कि गोंडी, देवार हल्बी और माड़िया सहित अन्य बोलियां एक दूसरे से इतनी अलग हैं कि एक बोली बोलने वाला समूह दूसरी बोली को समझता तक नहीं है।





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