लंदन.
मशहूर अर्थशास्त्री और 2002 के दंगों के बाद से अपने गृह राज्य गुजरात आने से मना कर चुके लॉर्ड मेघनाद देसाई का मानना है कि गुजरात के चुनावों में नरेंद्र मोदी जीतेंगे।
ऐसा मानने के पीछे उनका चिंतन नहीं बल्कि गुजरात की अर्थव्यवस्था है जो मोदी के राज में बूम पर है। इसके अलावा वहां वास्तविक और दमदार विपक्ष का अभाव भी मोदी की वापसी का एक कारण हो सकता है। हालांकि अगर उन्हें वोट डालना होता तो वे मोदी और भाजपा के पक्ष में किसी कीमत पर वोट नहीं डालते।
मोदी के बारे में नहीं बदला उनका नजरियाएक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मोदी के बारे में वह जो कुछ भी सोचते हैं उस पर ध्यान दिए बगैर कहा जा सकता है कि गुजरात में उनका कोई विरोध नहीं है। कांग्रेस के पास अच्छी साख वाला कोई प्रत्याशी नहीं है और वह सोचती है कि भाजपा में विघटन से काम चल जाएगा। कांग्रेस के पास न तो कोई विजन है और न ही रणनीति।
गुजरात धुर दक्षिणपंथ की ओरगुजरात धुर दक्षिणपंथी राजनीति की ओर चला गया है। मोदी के खिलाफ सेकुलर विपक्ष हो पाना बहुत कठिन काम है और ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने इसे राज्य के ऊपर छोड़ दिया है।
यह है गुजरात नहीं जाने की वजह
22 वर्ष की उम्र में डॉक्टरेट करने वाले गुजरात में जन्मे लॉर्ड देसाई ने 2002 में वहां हुए दंगों का विरोध किया था। विरोध स्वरूप वे अहमदाबाद या बड़ोदा में रहने वाले अपने भाइयों से मिलने तक नहीं गए। बकौल देसाई,‘मैं नहीं चाहता कि लोग सोचें कि गुजरात के हालात सामान्य हो गए हैं। इसकी वजह न केवल सरकार की मुस्लिम विरोधी नीति है बल्कि उसका वह रवैया भी है जिसके नाते कलाकारों, पत्रकारों, उदारवादियों की आवाजें खामोश हैं। सांस्कृतिक रूप से वहां बहुत कुछ गलत हो रहा है लेकिन ज्यादातर लोग हिंदुत्व ब्रिगेड की छिटपुट हिंसा पर ध्यान नहीं देते हैं।’
ग्रोथ मोदी नहीं गुजरातियों की देनलंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. देसाई का मानना है कि गुजरात की तरक्की के पीछे मोदी का नहीं, वहां के लोगों की उद्यमिता और लगन है। गुजराती लोग काफी पहले से उदारवादी अर्थव्यवस्था चला रहे हैं। मोदी तो अभी आए हैं। एक बार जब रिफॉर्म शुरू हो जाता है तो इकोनॉमी केवल ग्रो करती है। अंबानी इसकी बेहरीन मिसाल हैं जिससे पता चलता है कि गुजराती कैसे काम करते हैं। प्लानिंग और कायदे-कानून उनकी राह में बाधा नहीं बन सकते।