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ईंधन बिना कैसे जले चूल्हा

बीकानेर. gas घरेलू गैस की आपूर्ति समय पर नहीं होने के कारण उपभोक्ताओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एक-एक माह बाद भी लोगों को गैस नहीं मिल रही। केरोसिन कोटे से मिलता है। जलाऊ लकड़ी का चलन सीमित होकर रह गया है।

शहर में विभिन्न गैस कंपनियों की आठ गैस एजेंसियों के यहां 67 हजार 274 उपभोक्ता गैस की कतार में खड़े हैं। फ्लेम गैस सर्विस, बीकानेर होलसेल भंडार, पेड़ीवाल गैस एजेंसी, डागा गैस एजेंसी, शिवशक्ति गैस सर्विस, सिद्धार्थ गैस सर्विस तथा वैद्य मघाराम गैस एजेंसी को उपभोक्ताओं को गैस उपलब्ध करवाने में कम से कम एक महीना लग रहा है। गैस कपंनियों से मिलने वाली सप्लाई शोर्ट होने के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है।

हालात यह है कि एक तरफ उपभोक्ता घरेलू गैस के लिए एजेंसियों पर चक्कर लगा रहा है वहीं दूसरी तरफ लोगों को वाहनों और ढाबों, होटलों के लिए गैस आसानी से उपलब्ध हो रही है। शहर में स्थित अधिकांश भुजिया बनाने के कारखानों में भी घरेलू गैस का उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है। इन लोगों को निर्धारित कीमत से सौ-पचास रुपए अधिक में गैस सिलेंडर आसानी से मिल जाता है।

रसद विभाग ने हाल ही में घरेलू गैस के दुरुपयोग को रोकने के लिए एक सप्ताह का अभियान चलाया था। इस दौरान 36 गैस सिलेंडर जब्त किए गए थे लेकिन गैस कंपनियों के प्रतिनिधियों का सहयोग विभाग को नहीं मिला।

संयुक्त अभियान में आरटीओ और पुलिस ने भी रसद विभाग को कोई सहयोग नहीं दिया। अभियान के बंद होते ही घरेलू गैस का दुरुपयोग फिर घड़ल्ले से होने लगा है। उपभोक्ताओं को समय पर रसोई गैस उपलब्ध करवाने के कोई प्रयास रसद विभाग और गैस कंपनियों की तरफ से नहीं किए गए हैं।

सर्दियों में बढ़ जाती है खपत घरेलू गैस की खपत सर्दियों में बढ़ जाती है। उपभोक्ता बिजली बचाने के चक्कर में गैस चूल्हा या गीजर पर पानी गर्म करने लगे हैं। इसमें गैस खर्च अधिक होती है। चार पहिया वाहन और गीजर का उपयोग करने वाले अनेक ऐसे उपभोक्ता हैं, जिनके पास एक से अधिक गैस कनेक्शन मिल जाएंगे। हालांकि गैस कंपनियां एक ही नाम पर एक से अधिक गैस कनेक्शनों को खारिज करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए गैस एजेंसियों पर दबाव बनाया जा रहा है।

नहीं मिलता केरोसिन, महंगी है लकड़ी डबल कनेक्शनधारकों को केरोसिन भी नसीब नहीं है और लकड़ी को ईंधन के रूप में उपयोग करने का चलन शहरी क्षेत्रों में लगभग खत्म हो चुका है। लकड़ियां जलाकर पानी गर्म करने का काम अब केवल पशुपालकों तक ही सीमित होकर रह गया है।

केरोसिन की मांग नहीं के बराबर है लेकिन डिपो होल्डर अपना कोटा जरूर उठाते हैं। इस माह के लिए 1164 किलोलीटर को कोटा जिले को आबंटित हुआ है। अधिकांश केरोसिन भट्टियां जलाने वालों या पेट्रोल में मिलावट के काम आ रहा है। अब बसें भी डीजल और केरोसिन मिक्स करके चलने लगी है।

>> रसोई गैस के दुरुपयोग को रोकने के लिए हाल में अभियान चलाया था। अब गैस एजेंसयों की जांच का अभियान चलेगा। केरोसिन की कालाबाजारी की सूचनाएं भी मिल रही हैं। शीघ्र ही इस मामले में कार्रवाई की जाएगी। -एम.एल.खींची, डीएसओ





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