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एक पल के जीवन से उम्र चुरानी है

परदे के पीछे.कहा जाता है कि सत्यजीत रे की पहली फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ के अंतरराष्ट्रीय महोत्सव में प्रथम प्रदर्शन पर निर्णायक ऊंघ रहे थे। एक ने ही पूरी फिल्म देखी, बाद में साथियों से मानवीय करुणा के इस दस्तावेज को पुन: देखने का आग्रह किया। फिल्म को शीर्ष पुरस्कार मिला और आने वाले वर्षो में सत्यजीत रे की फिल्मों ने हर महोत्सव में पुरस्कार जीते। क्या इस घटना में एक निर्णायक के इत्तेफाक से जगे रहने को भाग्य कहेंगे?

शायद अच्छे लोगों से सही वक्त पर मुलाकात ही समय के महत्व को रेखांकित करते हुए भाग्य कहलाता है। पांचवे दशक के प्रसिद्ध फिल्मकार महबूब खान ने ख्वाजा अहमद अब्बास की पटकथा ‘आवारा’ पर फिल्म बनाने में झिझक दिखलाई। उन्हें यकीन था कि अब्बास उनके निर्णय का इंतजार करेंगे। उस रात शिवाजी पार्क में शमशान घाट के निकट होने के कारण सस्ते होटल में अब्बास अपने पत्रकार वीपी साठे के साथ काम कर रहे थे और राजकपूर ने वहां पहुंचकर ‘आवारा’ की पटकथा सुनी और तुरंत ही सौदा कर लिया।

इस छोटी घटना पर ही आधारित है राजकपूर की ख्याति और सामाजिक प्रतिबद्धता का वह दृष्टिकोण, जिसने उन्हें मनोरंजन के साथ सार्थकता जोड़ने का गुर सिखाया। जब डैनी ने फिरोज खान की ‘धर्मात्मा’ के कारण समय के अभाव में ‘शोले’ की गब्बर की भूमिका अस्वीकृत की, तब सलीम-जावेद को एक नाटक में अमजद खान की भूमिका याद आई और गब्बर सिंह के पात्र ने इतिहास रच दिया।

संजीव कुमार को शशधर मुखर्जी के फिल्मालय अभिनय स्कूल में दाखिला नहीं मिला और आरके नैयर ने उनकी सिफारिश की। संजीव ने इतिहास रचा है। सिनेमा, साहित्य, समाज में अनेक क्षण हैं जो मामूली दिखते हैं, परंतु समय को ही बदल देती है। जिस दंभी अंग्रेज ने द.अफ्रीका में प्रथम श्रेणी का टिकट होते हुए भी गांधी को डिब्बे से बाहर फेंका था, उसे क्या मालूम था कि यही व्यक्ति अंग्रेज साम्राज्य के साम्राज्यवाद को समाप्त कर देगा।

आप दरख्त के नीचे बैठे हैं तो फल को टपकते देखेंगे ही, परंतु न्यूटन ने इस घटना से प्रेरित होकर गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोज निकाला। अपनी टूटी-फूटी प्रयोगशाला में मैडम क्यूरी अनेक वर्ष तक काम करते-करते थक गई थीं और उन्हें नैराश्य ने घेर लिया था। जबरदस्त सर्दी का रात में उन्होंने निर्णय लिया कि वे अब अपना अनुसंधान बंद कर देंगी। उस रात अलसभोर के समय वे उठीं और उनींदी अवस्था में आखिरी बार प्रयोग करने का निर्णय लिया। यही क्षण निर्णायक सिद्ध हुआ।

अनुराग बसु छोटे परदे के लिए थ्रिलर बनाते थे। महेश भट्ट ने उन्हें ‘साया’ की असफलता के बाद भी ‘मर्डर’ में दोहराया और कामयाबी मिली। कैंसर से मुक्त होकर अनुराग ने ‘गैंगस्टर’ नामक फिल्म बनाई, जो अपनी अद्भुत गुणवत्ता के बावजूद सफल नहीं हो पाई। कुछ माह पूर्व राकेश रोशन ने ‘क्रिश-२’ पर काम करते हुए थकावट महसूस की और तरोताजा होने के लिए डीवीडी पर इत्तेफाक से ‘गैंगस्टर’ लगाई। यह फिल्म देखकर वे इतने अभिभूत हुए कि अगले दिन अनुराग से मिले और उन्हें अपनी एक पुरानी कहानी सुनाई, जिस पर अनुराग ने तीन माह परिश्रम करके मनोरंजक पटकथा गढ़ ली और रितिक अभिनीत यह फिल्म शायद अप्रैल से बनना शुरू हो।

बहरहाल ‘क्रिश-२’ को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है। राकेश रोशन की संस्था कम बजट की ‘क्रेजी-४’ अप्रैल में प्रदर्शित करेगी, जिसमें केवल रितिक पर बतौर मेहमान कलाकार एक आइटम सांग की शूटिंग ही बाकी है। सारांश यह है कि किसी भी क्षण को साधारण या निर्थक नहीं समझना चाहिए। हर क्षण के गर्भ में एक महान संभावना छिपी होती है। संतोष आनंद ने मनोज कुमार की फिल्म ‘शोर’ के लिए एक गीत लिखा था- ‘एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है। जिंदगी और कुछ भी नहीं, तेरी-मेरी कहानी है। ..दो पल के जीवन से एक उम्र चुरानी है।’





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