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उपहार फैसले का संदेश

सम्पादकीय. दिल्ली के उपहार सिनेमाघर में 13 जून 1997 को हुए भीषण अग्निकांड मामले में एडीशनल जज ममता सहगल ने ख्यात बिल्डरों-सुशील अंसल और गोपाल अंसल समेत सभी 12 अभियुक्तों को दोषी ठहराकर एक दूरगामी फैसला दिया है। 59 बेकसूर लोगों की मौत का कारण बने इस हादसे के दोषियों को अदालत ने अभी सजा नहीं सुनाई है फिर भी यह मानने से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस मामले में देर से ही सही, न्याय हुआ है।

कोर्ट ने अंसल बंधुओं और तीन अन्य अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए और सिनेमेटोग्राफी कानून के तहत दोषी ठहराया है और उन्हें ज्यादा से ज्यादा दो साल की कैद की सजा हो सकती है। इस वजह से हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों के संगठन-‘एसोसिएशन ऑफ विक्टिम्स ऑफ उपहार ट्रेजेडी’ ने न्याय नहीं मिलने की शिकायत की है मगर यह शिकायत भावनाओं पर आधारित है न कि तर्को पर।

अभियुक्त हाई-प्रोफाइल हों तो उन्हें ज्यादा सजा वाली धाराओं के तहत दोषी ठहराए जाने की अपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं है। अन्य सात अभियुक्तों को तो गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया है और उन्हें उम्रकैद तक की सजा सुनाई जा सकती है। अपने समय की सुपर हिट फिल्म ‘बॉर्डर’ के प्रदर्शन के दौरान उपहार सिनेमाघर में दिल्ली विद्युत बोर्ड के ट्रांसफार्मर से लगी आग वस्तुत: नियम-कानूनों के प्रति लापरवाही बरतने की बढ़ती दुष्प्रवृत्ति का नतीजा थी।

यह ट्रांसफार्मर सिने-दर्शकों की सुरक्षा की सरासर अनदेखी करके सिनेमाघर के परिसर में तलघर में लगाया गया था। आग लगने पर सिनेमाघर के कर्मचारियों ने बालकनी के दरवाजे खोलने में तत्परता नहीं दिखाई जिसके कारण धुएं में दर्शकों का दम घुट गया। सिनेमाघर के कर्ता-धर्ता ऐसी लापरवाही बरतने वाले अकेले नहीं हैं।

देश के बहुत से सार्वजनिक स्थलों में इस तरह की लापरवाही बरता जाना आम है। न जाने कितने स्थानों पर ऐसे हादसे दोहराए जाने की आशंका बनी हुई है। अदालत का फैसला ऐसे लोगों के लिए चेतावनी है कि वे लापरवाही की प्रवृत्ति से बाज आएं तथा नियम-कानूनों के पालन में किसी तरह का समझौता नहीं करें, अन्यथा कानून उन्हें बख्शेगा नहीं।

यह फैसला उन सरकारी एजेंसियों व कर्मचारियों के लिए भी नसीहत है जिनकी मिलीभगत से रसूखदार लोग नियम-कानूनों को ताक पर रख देते हैं। फैसले की सार्थकता भी इसी में है कि उपहार सिनेमाघर जैसा हादसा फिर कहीं नहीं दोहराया जाए।





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