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भोपाल.
अंतरराष्ट्रीय पत्रिका टाइम ने कहा है कि भारत की नौकरशाही, प्रांतवाद और बहुदलीय सरकारें अनुकूल व्यावसायिक माहौल बनाने में बाधक साबित हो रही हैं। पत्रिका ने यह निष्कर्ष अपने 26 नवंबर के अंक में 113 कारकों के आधार पर बनाई गई ग्लोबल कांपीटीटिवनेस रिपोर्ट में निकाला है। इसमें चीन (34वां) भारत (48वां) से आगे है।
इंडेक्स तैयार करने वाले कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री जेवियर सला-ई-मार्टिन की राय में भारत जैसे विकासशील देशों में लोकतंत्र आर्थिक विकास में मदद नहीं करता। मार्टिन यह भी मानते हैं कि इसका यह मतलब नहीं निकालना चाहिए कि लोकतंत्र की जरूरत नहीं है। जिन देशों में आमदनी बढ़ती है, वहां लोकतंत्र की मांग तेज हो जाती है। मार्टिन के मुताबिक अर्थशास्त्री लोकतंत्र को एक लक्जरी कह सकते हैं।
क्या है समस्या:
टाइम ने लिखा है कि भारत की नौकरशाही, बहुप्रांतीयता और बहुदलीय लोकतंत्र के विकास में बाधक होने की बातें अक्सर होती रही हैं। वहीं चीन की कम्युनिस्ट सरकार को आर्थिक मसलों पर सहमति बनाने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती है।
भारत बनाम चीन:
भारत प्रबंध संस्थानों की गुणवत्ता के मामले में दुनिया के आठ देशों में से एक है। चीन बचत के मामले में सातवीं पायदान पर है, लेकिन भारत का बैंकिंग तंत्र चीन के मुकाबले ज्यादा भरोसेमंद है।
ज्यादा टैक्स, ज्यादा तरक्की:
टाइम की रिपोर्ट ने इस मिथक को भी तोड़ा है कि टैक्स की ऊंची दरें विकास में बाधक होती हैं। यह बात सही है कि कम टैक्स दरों वाले अमेरिका और स्विट्जरलैंड के नाम शीर्ष पर हैं, लेकिन बहुत ज्यादा टैक्स दरों वाले स्वीडन, फिनलैंड और डेनमार्क को भी व्यवसाय के लिए सबसे बेहतर देश माना गया है।
पायदानों के अर्थ
1. प्रबंध संस्थानों की गुणवत्ता के मामले में भारत अगर आठवीं पायदान पर है, तो बिजली आपूर्ति के मामले में 106वें स्थान के साथ सबसे खराब जगहों में से है।
2.चीन राष्ट्रीय बचत के मामले में सातवां स्थान रखता है, लेकिन बचत को सहेजने लायक भरोसेमंद बैंकिंग तंत्र (128वां) उसके पास नहीं है।
3. डेनमार्क, स्वीडन और फिनलैंड में लोग ज्यादा टैक्स चुकाकर भी कारोबार करना चाहते हैं।
(टाइम) टेबल
ग्लोबल कांपीटीटिवनेस
देश रैंक
अमेरिका 1
स्विट्जरलैंड 2
डेनमार्क 3
स्वीडन 4
जर्मनी 5
फिनलैंड 6
सिंगापुर 7
जापान 8
ब्रिटेन 9
नीदरलैंड्स 10
चीन 34
भारत 48