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अभिमत. नंदीग्राम के बहाने वामपंथियों खासकर माकपा का ऐसा चेहरा उभरकर सामने आया है जिसे देखकर खुद को गर्व से कम्युनिस्ट घोषित करने वाले भी शर्मसार हैं। वामपंथ ने श्रमिकों और बुद्धिजीवियों को बराबर प्रभावित किया था।
नंदीग्राम में तो हंसिया हथौड़ा खेतिहर मजदूरों के गले और सिर पर पड़ रहा है, लेकिन बुद्धिजीवी भी मोर्चा लेकर माकपा के खिलाफ सड़क पर उतर आए हैं। महाश्वेता देवी, अपर्णा सेन से लेकर गौतम घोष तक साहित्यकार और कलाकर्मी नंदीग्राम के दमन से आहत हैं।
गौतम घोष तो यहां तक कहते हैं कि उन्हें वामपंथ का यह रूप देखकर खुद को कम्युनिस्ट कहने में शर्म आती है। ऐसा कहने वाले अकेले गौतम घोष भर ही नहीं हैं, ज्योति बसु की कैबिनेट में वित्तमंत्री रहे अशोक मित्रा भी कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं।
यह कितने दुयरेग की बात है कि आज समान्यजन भी नंदीग्राम की तुलना गोधरा के साथ करने लगा है। गोधरा के नरसंहार और नंदीग्राम के दमन में अंतर है लेकिन संघ परिवार और माकपा की सोच अपने-अपने संदर्भो में एक सी है।
यदि नरेंद्र मोदी गोधरा के नरसंहार को क्रिया की प्रतिक्रिया कहते हैं तो बुद्धदेब भट्टाचार्य भी यह कहने में जरा भी वक्त नहीं लगाते कि पिछले ग्यारह महीनों से भूमि प्रतिरोध उच्छेद समिति, त्रृणमूल कांग्रेस और माओवादियों ने जिस तरह से रक्तपात मचा रखा था माकपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें उन्ही के अंदाज में जवाब दिया है।
सच तो यह है कि नंदीग्राम और गोधरा, सीपीएम और आरएसएस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक ने पार्टी के अस्तित्व और स्वाभिमान के नाम पर फासीवादी चेहरा दिखाया तो दूसरे ने हिंदुत्व की रक्षा के लिए। इनका लोकतंत्र से दूर-दूर तक वास्ता नहीं है। एक के लिए पॉलित ब्यूरो का हुक्म अंतिम है तो दूसरे के लिए सरसंघ संचालक का आदेश पत्थर की लकीर।