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जयपुर. राजस्थान में सर्वशिक्षा अभियान के बावजूद हर रोज 376 बच्चे पढ़ाई छोड़ जाते हैं। हालात इतने बदतर हैं कि चार साल के दौरान शिक्षा पर करीब 20 हजार करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद प्रदेश के साढ़े पांच लाख बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं।
सीनियर सैकंडरी स्तर पर तो हालात और भी खराब हैं। 12 साल पहले पहली कक्षा में 15 लाख बच्चों ने प्रवेश लिया था, लेकिन आज 12वीं कक्षा में सिर्फ साढ़े तीन लाख ही छात्र हैं। यानी शिक्षा विभाग साढ़े आठ लाख बच्चों को स्कूलों में नहीं रोक पाया। सर्वशिक्षा अभियान के तहत सामने आए ताजा आंकड़ों ने शिक्षा के परिदृश्य की काफी धूमिल तस्वीर पेश की है। विभाग के आकलन के अनुसार प्रदेश में 34 हजार 922 बालक-बालिकाओं ने तो स्कूल का दरवाजा ही नहीं देखा है। इनमें बालिकाओं की संख्या 19990 है, जबकि बाकी बालक हैं।
विभाग के अधिकारी बताते हैं कि पिछले सालों की तरह शिक्षा के इस सत्र में प्रारंभिक शिक्षा ले रहे 1 लाख 15 हजार 626 बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं। इनमें 65 हजार से ज्यादा बालिकाएं हैं। पिछले साल 1 लाख 18 हजार 899 बच्चे पढ़ाई छोड़कर चले गए थे। ड्रॉपआउट मामले में सबसे खराब तस्वीर जैसलमेर, भरतपुर और उदयपुर जिलों की है। इनमें से हरेक जिले में हर साल 7 हजार से 10 हजार बच्चे स्कूल छोड़ जाते हैं, लेकिन इनके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं है।
नियंत्रक महालेखापरीक्षक ने पहले ही चेता दिया था
नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने पहले ही चेताते हुए कई अनुशंसाएं की थी, लेकिन उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया गया। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार आंकड़े दर्शाते हैं कि सभी बच्चों को स्कूलों में नामंकित करने का मकसद निर्धारित तिथि तक प्राप्त नहीं किया जा रहा है। प्रथम मकसद के हासिल नहीं करने विपरीत प्रभाव 2007 तक पांच साल की प्राथमिक स्कूल शिक्षा पूरी कर रहे बच्चों पर भी पड़ेगा।
सीएजी ने चयनित जिलों के 144 गांवों के 148 स्कूलों का सर्वे कराने के बाद इसी साल मार्च में जारी की गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि स्वनिष्कासित या कभी स्कूल नहीं जाने वाले बचें के संबंध में सर्वे हुआ तो जहां कभी नामांकित नहीं बच्चों की संख्या 274 बताई गई थी, वहीं लेखा परीक्षरा के अध्ययन में यह संख्या 876 पाई गई थी।
महालेखा परीक्षक की अनुशंसाएं
* हर स्तर पर क्रियान्वयन में विलंब से बचें।
* अनुदान का मैचिंग हिस्सा जल्द जारी करें।
* चाइल्ड ट्रेकिंग सिस्टम के तहत आंकड़े एक स्वतंत्र संस्था से सत्यापित हों।
सरकार ने विल पावर ही पैदा नहीं की : भादू
* सचाई तो ये है कि सरकार बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों में पढ़ने-पढ़ाने की विल पावर ही पैदा नहीं की। इससे यह पूरा वर्ग कटा जा रहा है। सरकार का ध्यान इन बच्चों की तरफ है ही नहीं।
राजाराम भादू, कार्यकारी निदेशक, समांतर
ड्रॉपआउट को कम करने की कोशिश : भार्गव
* ड्रॉपआउट दर को कम करने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पाठ्यपुस्तकों को आनंददायक बनाया जाएगा। बालिकाओं के स्कूल छोड़ने के पीछे बालविवाह भी एक समस्या है। हमने शिक्षकों को कहा है कि वे हर उस बच्चे का पीछा करें, जो स्कूल छोड़कर जा रहा है। उसके परिवार से संपर्क करने और समाज से भी संपर्क किया जाए।
सुधीर भार्गव, प्रमुख सचिव, स्कूल शिक्षा
ड्रॉपआउट समाज के लिए खतरनाक : जैन
* ड्रॉपआउट दर चिंताजनक है। इस वजह से राज्य का मानव संसाधन दक्ष नहीं बन पाएगा। विकास के सामाजिक संकेतकों में प्रदेश पिछड़ जाएगा। न जॉब मार्केट में हालात ठीक होंगे और न सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से ही यह ठीक है। प्रदेश का सामाजिक प्रोफाइल खराब होगा।
रश्मि जैन, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
अभियान का मकसद
* प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन, ठहराव और गुणात्मक शिक्षा।
* छह से 11 साल तक के सभी बच्चों को स्कूल, शिक्षा गारंटी केंद्र, वैकल्पिक विद्यालय या विद्यालय वापसी शिविरों में नामांकित करवाना।
* सभी बच्चों को पांच साल तक स्कूलों में रोके रखकर शिक्षित करना।
* 11 से 14 साल के सभी बच्चों को 2010 तक प्रारंभिक शिक्षा के आठ साल पूरे कराना।
* 2007 तक प्राथमिक स्तर तक सभी लिंग तथा सामाजिक श्रेणियों के अंतर को पाटना।
* 2010 तक हर बच्चे को स्कूल में पूरी तरह शिक्षित करना।
असलियत ये है
* नामांकन के उद्देश्य की उपलब्धि लक्ष्य की तुलना में कम।
* स्कूलों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में कमी।
* वाषिर्क कार्ययोजना के अनुसार निधियां उपलब्ध नहीं कराई र्गई।
* नमूना जांच के अनुसार राशि अनुपयोजित रह जाती है।
* ग्रामीण क्षेत्र के कुछ स्कूलों में शिक्षक-छात्र रेशो 1:40 की तुलना में 1.43 से 1.106 तक।
सर्व शिक्षा अभियान
यानी ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, शिक्षा कर्मी बोर्ड, लोक जुंबिश परियोजना, जनशाला, जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम चरण एक व चरण दो तथा शिक्षा गारंटी योजना।