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अब खुलीं दुनिया की आंखें

अभिमत. संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी दुनिया को यह बात समझने में काफी वक्त लगा कि परमाणु शक्ति संपन्न देश के रूप में भारत की स्थिति पाकिस्तान से पूरी तरह अलग है। पाकिस्तान की मौजूदा आपाधापी के बीच यह फर्क अब और भी स्पष्ट नजर आने लगा है। पाकिस्तान के परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ लग जाएं, यह खतरा फौरन तो नहीं है मगर किसी भी तरह से अवास्तविक भी नहीं है।

आम धारणा यही है कि जब तक पाकिस्तान में किसी भी तरह की सरकार का अस्तित्व है, यह आशंका हकीकत नहीं बन सकती। परवेज मुशर्रफ भले ही सरकार के मुखिया हैं, मगर क्या समूचे देश पर उनका नियंत्रण है, यह एक बहस का मुद्दा है।

बड़ी तादाद में जनजातीय समुदाय के तत्व और उग्रवादी, आतंकवादी तथा जेहादी घात लगाए घूम रहे हैं, परमाणु अस्त्रों तक अपनी पहुंच बनाकर उन्हें खुशी होगी। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इन परमाणु हथियारों की सुरक्षा के कदम उठाने के लिए बुश प्रशासन ने 10 करोड़ डॉलर तक खर्च किए हैं।

अखबार के मुताबिक पाक में इन हथियारों पर नियंत्रण के लिए इनके हिस्सों को अलग-अलग स्थानों पर रखा गया है, ताकि इन्हें जोड़कर कोई परमाणु बम तैयार न कर सके। मगर बुश प्रशासन की यह रणनीति अचूक नहीं है, क्योंकि अभी भी वह पाक सेना पर काफी भरोसा रखता है।

पाक सेना में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो अतिवादियों से हमदर्दी रखते हों। इस आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिकी ही पाक परमाणु ठिकानों पर कब्जा कर लें। भारत के दृष्टिकोण से, ऐसे खुले परमाणु अस्त्र उसके लिए सबसे ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं।

अपुष्ट रिपोर्टो के अनुसार, परमाणु हथियार गलत हाथों में पड़ने की स्थिति से निपटने के लिए अमेरिका ने पाक की परमाणु क्षमता निष्क्रिय करने की योजना बनाई है। संभवत: भारत को भी इस योजना में शामिल करने का प्रयास है। जो भी हो, इस पूरे मामले पर सतर्कतापूर्ण नजर रखना बेहद जरूरी है।





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