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इंदौर.
हीरानगर कांड के आरोपी टीआई दयालुप्रसाद अहिरवार को ब्लड कैंसर की पुष्टि के बाद पुलिस विभाग फिटनेस की व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा हो गया है। वे अभी कैंसर अस्पताल में भर्ती है और दस साल में कई शहरों में पदस्थ रहते हुए महंगा इलाज कराते रहे लेकिन विभाग को पता नहीं लगा।
मंगलवार को श्री अहिरवार को एमवायएच से कैंसर अस्पताल रैफर किया गया था। उनके डिस्चार्ज कार्ड में बीमारी का खुलासा हुआ। वहां जबलपुर अस्पताल के कागजात बताए गए जिनमें 1997 में क्रॉनिक बायलाइट लिक्युमिया होना बताया गया। तब डॉ. पुष्पा किरार ने इलाज किया था।
अब टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुंबई से चल रहा है। हाल ही में उनके खून में श्वेत रक्त कोशिकाएं (डब्ल्यूबीसी) कम आने के बाद बीमारी की फिर पुष्टि हुई। उन्हें अस्पताल से तो जल्दी छुट्टी मिल जाएगी लेकिन इलाज चलता रहेगा।
परिवार से भी छिपाई
टीआई अहिरवार ने न परिवार को बीमारी की जानकारी दी, न विभाग को।
मुझे पता नहीं था
>> ‘बीमारी की जानकारी मुझे नहीं थी। स्थापना शाखा से पता लगाकर ही कुछ कहा जा सकेगा।’
अंशुमान यादव, एसपी
फरार पुलिसकर्मियों पर भी शिकंजा
तीनों फरार पुलिसकमिर्यों शैलेंद्रसिंह, शैलेंद्रसिंह उर्फ सोनू और रवि यादव की गिरफ्तारी के लिए भी घेराबंदी शुरू कर दी गई है। पता चला है तीनों मप्र में नहीं हैं। मजिस्ट्रियल जांच में भी उपस्थित नहीं होने के बाद पुलिस उनके नजदीकियों को हिरासत में लेकर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।
टीआई के जज्बात या विभाग की लापरवाही
डॉक्टर्स ने बताया उन्हें 1997 से यह बीमारी है। हर हफ्ते अधिकारियों की परेड होती है। उसका एक मकसद भी फिटनेस चेक करना ही है लेकिन दस साल में कभी पता नहीं लगा।
नजदीकी बताते हैं वे भावनात्मक व्यक्ति हैं इसलिए परिवार से छिपाते रहे। दूसरी ओर थाने में उनकी सख्त कार्यशैली का परिणाम हीरानगर कांड है। दोनों में गहरा विरोधाभास है।
बीमारी का इलाज काफी महंगा है। उन्हें लंबे समय से चार-पांच सौ रुपए रोज की एंटी कैंसर ड्रग दी जा रही है। क्या तब भी विभाग को पता नहीं चला?
क्रॉनिक बायलाइट लिक्युमिया में रेडिएशन भी दिया जाता है, जिसमेंकाफी समय लगता है। क्या उन्होंने कहीं रेडिएशन भी लिया?
इलाज के लिए वे कई बार मुंबई गए। तब विभाग से अनुमति या चिकित्सा अवकाश लिया?