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स्वाद बिगड़ने से जवान भड़के

रायपुर. चावल और दाल-सब्जी इस कदर बेस्वाद है कि पेट में चूहे कूदने के बावजूद जवान भरपेट भोजन नहीं कर पाते। इस मुद्दे पर जवानों ने हड़ताल भी की लेकिन लाइन के अफसरों के कानों में जूं नहीं रेगी। पुलिस के आला अफसरों से गुप्त शिकायत का भी नतीजा नहीं निकला।

हालांकि सिटी एसपी डा. लाल उमेद सिंह के कानों तक बात पहुंची थी। उन्होंने लाइन के आरआई आरके मिंज को चिट्ठी लिखकर जवानों के भोजन का स्वाद सुधरवाने के निर्देश दिए थे। उनकी चिट्ठी के बाद एक-दो दिनों तक अच्छा भोजन परोसा गया, उसके बाद फिर वही पुराना ढर्रा शुरु हो गया।

‘दैनिक भास्कर’ को शिकायत मिलने पर भास्कर की टीम ने ऐन उस वक्त सर्वे किया जब लाइन के जवान भोजन कर रहे थे। संवाददाता को देखते ही जवान फट पड़े। गुस्से से भरे जवानों ने मोटे चावल और पतली दाल दिखाते हुए कहा-आप ही बताइये ऐसा खाना क्या इंसानों को दिया जाता है। हम क्या कैदी हैं, जो इस तरह का भोजन देकर सजा दी जा रही है।

एक जवान ने आलू की पनिहर सब्जी दिखाकर कहा यहां तो आलू या सोयाबीन की सब्जी खा-खाकर हम बोर हो चुके हैं। अफसरों को और दूसरी सब्जी सूझती नहीं। हरी सब्जी खाए तो अर्सा हो चुका है। हफ्ते में एक दिन अंडा परोसा जाता है, उसके लिए भी कई तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। जवानों ने शिकायत करते हुए बताया कि रोज-रोज आधा पेट भोजन करने से हमारी सेहत पर असर पड़ने लगा है।

भरपेट भोजन न मिले तो हम मुस्तैदी से अपनी जिम्मेदारी कैसे निभा सकते हैं। जवानों ने कड़े तेवर अपनाते हुए कहा कि अगर कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा तो यहां उग्र आंदोलन करके उच्च अधिकारियों तक बात पहुंचायी जाएगी।

हालांकि जवानों को इस बात का भी मलाल है कि वे ऐसे पेशे से जुड़े हैं कि अनुशासन के कारण खुलकर अपनी बात आला अफसरों तक नहीं पहुंचा सकते। यहां 500 नवआरक्षक हैं, जिनमें से 250 अभी बाहर गए हुए हैं।

ये है पुलिस लाइन का मीनू- जवानों को नियमानुसार सुबह के नाश्ते में पोहा, भजिया, केला, अंडे का आहार, एक गिलास दूध, जलेबी, कार्नफ्लेक्स आदि। दोपहर और रात के खाने में दाल-चावल, रोटी और हर प्रकार की मौसमी सब्जी, सलाद, अचार। इसके अलावा सप्ताह में एक दिन स्पेशल खाने के रूप में नान-वेज, वेज में पनीर, खीर, मिठाई आदि में से एक आइटम खाने के साथ मिलने का है।

1000 रुपए कटते हैं वेतन से :
लाइन के जवानों से दो टाइम के भोजन के एवज में एक हजार रुपए महीना वसूला जाता है। लाइन के अफसरों ने रसोईघर को ठेके पर दे दिया है। ठेकेदार अफसरों की मर्जी से चलते हैं। चंकि मेस की फीस जवानों के वेतन से सीधे काट ली जाती है, इसलिए वे चाहकर भी विरोध स्वरुप पेमेंट नह रोक सकते। जवानों से भोजन के एक हजार रुपए लिए जाते हैं।

होटल से नहीं मंगवा सकते
लाइन में होटल से टिफिन या पैकेट मंगवाकर भोजन करना बैन है। कोई भी जवान अपनी मर्जी से शहर के किसी भी मेस से न तो टिफिन बंधवा सकता है और न ही होटल का खाना मंगवाकर खा सकता है। लाइन के अफसर शासन द्वारा निर्धारित मीनू के अनुसार भोजन भले ही नही परोसते लेकिन भोजन बाहर से मंगवाने के नियम का पालन जरुर कड़ाई से करवाते हैं। जवानों को यही बात सबसे ज्यादा सालती है।





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