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इंदौर. आरटीओ के लाइसेंस सेक्शन, विजयनगर में अब हर महीने बमुश्किल 350 लर्निग लाइसेंस बनते हैं जबकि स्कूलों में तीन-साढ़े तीन हजार। इसके चलते कम्प्यूटर से टेस्ट लेने की व्यवस्था भी बेकार साबित हो रही है।
करीब डेढ़ साल पहले लर्निग लाइसेंस के लिए साफ्टवेयर बनाकर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसी व्यवस्था लागू की गई थी। उसमें दस में से छह प्रश्नों के सही जवाब देने पर ही लर्निग लाइसेंस बनता था। एक शिफ्ट में चालीस आवेदक टेस्ट दे सकते थे। जून से स्कूलों में लर्निग लाइसेंस बनने लगे और यह व्यवस्था लगभग अनुपयोगी हो गई। तब दिनभर में 8-10 शिफ्ट में टेस्ट होती थी जबकि अब बमुश्किल एक-दो।
इसके विपरीत स्थायी (पक्के) लाइसेंस के लिए हर महीने तीन-साढ़े तीन हजार आवेदक आ रहे हैं। आरटीओ गिरीशमोहन पाठक के मुताबिक लर्निग लाइसेंस के पहले टेस्ट लेने का मकसद था नियमों की जानकारी रखने वाला ही वाहन चलाए। शासन के आदेश पर सरकारी स्कूलों से भी लर्निग लाइसेंस बनने लगे, तबसे विजयनगर में आवेदकों की संख्या दस प्रतिशत से भी कम रह गई।