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इंदौर. श्रीगुरुनानक देवजी अपनी दूसरी धर्म प्रचार यात्रा (उदासी) के दौरान विक्रम संवत 1568 में पश्चिम से लौटते वक्त इंदौर आए थे।
गुरबानी स्टडी सर्कल के चेयरमैन मनजीतसिंह भाटिया के मुताबिक यहां उन्होंने खान नदी के किनारे इमली के पेड़ के नीचे आसन जमाया था और एक शबद की व्याख्या की थी। तब उनके प्रिय शिष्य भाई मर्दाना की रवाब तथा गुरुजी के वचन सुनकर लोग निहाल हो गए थे। इसी स्थान पर अब गुरुद्वारा इमली साहब है।
इंदौर आगमन के दौरान ही गुरुदेव बेटमा, ओंकारेश्वर और उज्जैन भी गए थे। गुरुनानकदेव ने पंजाब की धरती पर एक नई संस्कृति शुरू की थी। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के जन कल्याण के लिए चार धर्मप्रचार यात्राएं (उदासियां) कीं और भारत के साथ ही मध्य पूर्व में इस्लामिक देशों के धर्म केंद्रों में जाकर विविध प्रकार की भारतीय और सामी धर्म परंपराओं का अध्ययन किया।
रतनजीतसिंह शैरी के मुताबिक गुरुनानक देव इंदौर में 18 दिन रहे। यहां के लोगों के बीच उन्होंने मूर्ति पूजा वर्जित की। ओंकारेश्वर में गुरुजी ने दक्षिणी ओंकार नामक वाणी की रचना की।