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तीस साल बाद बेटा मैदान में

इंदौर. खरगोन लोकसभा उपचुनाव के लिए कांग्रेस से अरुण यादव के नामांकन दाखिल करने के साथ ही पश्चिमी निमाड़ की राजनीति में 30 साल पुराना इतिहास दोहराया गया। 1977 में पार्टी ने तमाम दिग्गजों को दरकिनार कर तब के युवा नेता सुभाष यादव को लोकसभा का टिकट दिया था।

बेटे को बमुश्किल टिकट दिला पाए श्री यादव के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई है। इसी कारण उन्होंने तमाम राजनीतिक मतभेदों और अहम को ताक में रख सबसे मदद मांगी है। इस चुनाव के नतीजों से ही उनका प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने रहना तय होगा। हालांकि विरोधियों का कहना है परिणाम जो भी रहें 15 दिसंबर के बाद नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति तय है।

कृष्णमुरारी मोघे जैसे कद्दावर नेता और कुशल संगठक के सामने अरुण की उम्मीदवारी के बाद खरगोन में कांग्रेस के राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। बेटे की जीत तय करने के लिए श्री यादव खरगोन में ही मोर्चा संभाल कर उन विरोधियों को साधने की कोशिश में हैं जिन्हें बेटा नहीं मना पाया।

तीन दिन पहले दिल्ली में कांग्रेस महासचिव वी. नारायण सामी के सामने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाने वाले बाला बच्चन व डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ अरुण का नामांकन दाखिल कराने के लिए समर्थकों के साथ पहुंचे। दोनों ने वहां हुई सभा में कहा जिसे सोनिया गांधी ने टिकट दिया है उसे गुटबाजी को परे रख हर हाल में जिताना है।

किसी समय एकदम करीबी रहे पूर्व विधायक परसराम डंडीर के साथ ग्यारसीलाल रावत और रवि जोशी को भी श्री यादव ने न्यौता है। हालांकि उनका रवैया अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। सबसे तीखे तेवर श्री डंडीर के हैं। वे समर्थकों के बीच कह चुके हैं किसी भी हालत में समझौता नहीं करेंगे। इनके अलावा भी थोकबंद वोटों पर नियंत्रण रखने वाले नेताओं से श्री यादव संपर्क साध रहे हैं।

श्री मोघे को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद से ही कांग्रेस से उम्मीदवारी के लिए आश्वस्त अरुण काफी लोगों से पहले ही संपर्क कर चुके हैं। अब वे पिता से नाराज नेताओं को साधने की कोशिश में जुटे हैं।





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