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मजहबी संगठनों ने झपटा नंदीग्राम मुद्दा

अभिमत. जुदा नजर आने वाली तीन घटनाओं- नंदीग्राम, रिजवानुर और तसलीमा को अगर आप एक साथ जोड़कर देखेंगे तो आपको प. बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ व्यापक मुस्लिम लामबंदी का एक फामरूला नजर आएगा। कोलकाता में हिंसा और पथराव का कारण रहे इन्हीं तीनों मुद्दों को मिलाकर कई मुस्लिम संगठनों ने नंदीग्राम का प्लेटफॉर्म अपने मतलब के लिए झपट लिया।

नंदीग्राम में माकपा का प्रतिरोध करने वाले प्रमुख बलों में से एक जमियत-ए-उलेमा-ए-हिंद के राज्य सचिव सिद्दीकुल्लाह चौधरी के मुताबिक महत्व के क्रम में नंदीग्राम, राज्य में मुस्लिमों का समग्र विकास, रिजवानुर और तसलीमा चार प्रमुख मुद्दे हैं जिनके लिए हम आंदोलन कर रहे हैं। तसलीमा का मुद्दा इनमें शामिल है, मगर मुख्य नहीं है। राज्य और केंद्र सरकार से हमारा कहना है कि तसलीमा के इस्लाम विरोधी लेखन पर रोक लगाई जाए। भूमि अधिग्रहण के विरोध का नेतृत्व कर जमियत को अच्छी लोकप्रियता मिली थी। भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के बैनर तले जमियत ने तृणमूल कांग्रेस व कांग्रेस के तत्वों से हाथ मिलाया था।

नंदीग्राम से माकपा समर्थकों को खदेड़ने में जमियत कार्यकर्ताओं की मुख्य भूमिका रही थी। मगर इस महीने की शुरुआत में एक विवादास्पद छापा मारकर माकपा ने इलाके पर फिर कब्जा कर लिया। जमियत का मानना है कि मुस्लिमों से जुड़े अन्य मुद्दों को जोड़कर वह हारी हुई जंग फिर जीत सकती है। इस तरह रिजवानुर और तसलीमा के मुद्दे शामिल हुए। तसलीमा का मामला अधिक दमदार इसलिए था कि उनके इस्लाम विरोधी लेखन से सुधारवादी मुस्लिम भी खफा हैं।

मुस्लिम सुधारवादी असगर अली इंजीनियर का भी कहना है कि अगर तसलीमा के भारत में रहने पर इतने लोग नाराज हैं तो सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। जमियत के अलावा इन अन्य धार्मिक संगठनों ने भी तसलीमा को भारत से बाहर करने के लिए देशव्यापी आंदोलन चलाने का फैसला किया है।





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