आंखों देखा पाकिस्तान. तीन नवंबर की रात जब जनरल मुशर्रफ पाकिस्तान टीवी पर देश में इमरजेंसी लगाने का एलान कर रहे थे तब मैं लाहौर में अपने दोस्त
और साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन (साफ्मा) के महासचिव इम्तियाज आलम के घर में बैठा उनसे बतिया रहा था। भाषण खत्म होते ही इम्तियाज चीख-से पड़े और बोले थे, ‘भाषण में अपने आठ साल के शासन को दोषी ठहराने के सिवाय मुशर्रफ ने कुछ भी तो नहीं कहा।’ जेहादियों के खिलाफ मुशर्रफ के रवैये के समर्थक रहे इम्तियाज और उन सरीखे बहुत से पाकिस्तानी मुशर्रफ द्वारा संविधानेतर कदम उठाने से क्षुब्ध व निराश हैं।
इमरजेंसी की अटकलें कई दिनों से हवा में थीं। इन्हें सत्ता में बैठे लोग ही तूल दे रहे थे। इसका एक उद्देश्य तो न्यायपालिका को धमकाना था और दूसरी तरफ नागरिकों को उनकी आजादी छिनने के लिए तैयार करना था। इस कारण तीन नवंबर की शाम साफ्मा के दफ्तर में मौलाना फजलुर रहमान के साथ मुलाकात के लिए जुटे वरिष्ठ पत्रकारों ने इमरजेंसी की घोषणा को बेहद सहजता से लिया। ऐसी घोषणाओं के बाद प्राय: जैसी अफरा-तफरी और दहशत नजर आती है उसका अता-पता नहीं था।
इमरजेंसी के एलान पर लोगों की प्रतिक्रिया भी एक जैसी नहीं थी। एक लोकप्रिय टीवी शो के एंकर और जाने-माने पत्रकार सुहैल वड़ैच फरमा रहे थे कि सब पहले जैसा ही चलेगा। राजनेता सौदेबाजी में मशगूल रहेंगे, रसूखदार लोग जी-हुजूरी के लिए सत्ता प्रतिष्ठान की चौखट पर दस्तक देते रहेंगे और आम लोग तमाशबीन की तरह सारा नजारा देखेंगे। कुछ पत्रकारों ने इमरजेंसी का स्वागत किया और कहा कि आखिरकार मुशर्रफ ने कट्टरपंथियों के खिलाफ सख्ती बरतने की हिम्मत दिखाई है। कुछ लोग मीडिया पर बंदिशों को लेकर चिंतित जरूर थे मगर वड़ैच पूरे यकीन से कह रहे थे कि टीवी चैनल चंद दिनों में फिर से काम करने लगेंगे। उनकी दलील थी कि बड़े मीडिया मालिकान ज्यादा दिन घाटा बर्दाश्त नहीं कर सकते। सरकार जैसा कहेगी वैसा करने में वे आनाकानी नहीं करेंगे। वड़ैच ठीक ही फरमा रहे थे। उनके अपने चैनल जिओ टीवी, जिसके मालिक मीर शकील-उर-रहमान अब तक सैनिक शासन के आगे मुस्तैदी से डटे रहे थे, आखिरकार झुक ही गए।
उस शाम छन-छनकर आने वाली खबरों से यह भी पता चला कि जनरल मुशर्रफ द्वारा जारी किए गए अस्थायी संवैधानिक आदेश में आतंक के खिलाफ युद्ध की बात बाद में जोड़ी गई। इस आदेश का असल निशाना तो न्यायपालिका और मीडिया ही थे। मुशर्रफ और उनके सलाहकारों का सोचा-समझा गणित था कि यदि वे परेशानी देने वाले जजों की छुट्टी करके उनकी जगह ऐसे जज बैठा देंगे जो कोई मीन-मेख निकाले बिना उनके आदेशों का पालन करेंगे तो फिर उन्हें किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। मीडिया के बारे में भी उनकी धारणा ऐसी ही थी।
पाकिस्तान में पिछले कुछ महीनों से राजनीति का दंगल सड़कों की बजाय अदालतों और मीडिया में खेला जा रहा था। राजनेता अदालतों में याचिकाएं दायर करके और टीवी चैनलों के टाक शो में हाजिरी दर्ज कराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने में लगे थे। पाकिस्तान के इतिहास में न्यायपालिका पहली बार कार्यपालिका को जवाबदेह बनाने की कोशिशों में लगी थी और सत्ता में बैठे लोग मान बैठे थे कि न्यायपालिका और मीडिया की बैसाखी के बिना भी उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी और विपक्ष का विरोध जल्दी ही थम जाएगा। यदि आम लोगों में मुशर्रफ के शासन का थोड़ा-बहुत समर्थन भी होता तो ऐसा हो भी जाता मगर आम लोग मुशर्रफ से जिस कदर घृणा करते हैं उसके मद्देनजर उनके शासन का विरोध थमने के आसार नहीं हैं। हालांकि यह विरोध सड़कों पर उतनी शिद्दत से दिखाई नहीं पड़ता।
पाकिस्तान के लोगों को मुशर्रफ पर जरा भी भरोसा नहीं रह गया है। लगभग हरेक व्यक्ति मानता है कि उन्होंने इमरजेंसी खुद की सल्तनत बचाने के लिए लगाई है। जजों पर आतंकवादियों को रिहा करने तथा लाल मस्जिद को फिर से कट्टरपंथियों के हवाले करने का आरोप लगाकर मुशर्रफ ने अपनी रही-सही विश्वसनीयता भी गंवा दी। उनके पास इस बात की कोई सफाई नहीं है कि उन्होंने ऐसा करने वाले दो जजों को बर्खास्त क्यों नहीं किया। देश के पढ़े-लिखे लोग न्यायपालिका के खिलाफ मुशर्रफ की तमाम दलीलों को सिरे से नकार देते हैं। उनके मुताबिक मुशर्रफ द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हर हुक्म सिर माथे पर लेने वाले जजों की नियुक्ति किए जाने से हिंसा और बढ़ेगी।
एक उर्दू अखबार के बुजुर्ग संपादक का कहना था कि मुशर्रफ सत्ता में बने रहने के लिए सैकड़ों बेकसूर लोगों के कत्ल समेत कुछ भी कर सकते हैं। यह पूछने पर कि सेना मुशर्रफ का साथ कब तक देगी, वे कहते हैं कि सेना कभी नहीं चाहती कि देश में वास्तविक लोकतंत्र कायम हो, मगर हालात बेकाबू होने पर वह मुशर्रफ को हटाने में हिचकेगी नहीं। फिलहाल मुशर्रफ द्वारा घोषित इमरजेंसी का वकील, पत्रकार और पढ़े-लिखे लोग थोड़ा-बहुत विरोध कर रहे हैं पर आम लोग ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति अपनाए हुए हैं। राजनेताओं ने भी अपने विकल्प खुले रखे हैं।
जनवरी में होने वाले चुनावों को लेकर वे गहरी दुविधा में हैं। यदि वे इन चुनावों में भाग लेते हैं तो बड़े पैमाने पर होने वाली धांधली के चलते उनकी जीत नामुमकिन है और यदि वे चुनाव में भाग नहीं लेते हैं तो मुशर्रफ के समर्थकों को वाक-ओवर मिल जाएगा। साथ ही वे सेना को नाराज करने का जोखिम मोल लेने से भी बचना चाहते हैं। कारण, खुदा न खास्ता वे सत्ता में आ गए तो पश्चिमी कबायली इलाके में कट्टरपंथी हिंसा को थामने के लिए उन्हें सेना की मदद की दरकार होगी। मुशर्रफ और उनके सलाहकार इस दुविधा को भुनाने की फिराक में हैं।
इन हालात में पाकिस्तान के राजनेताओं पर अहम जिम्मेदारी है। यदि वे सड़क पर उतरकर माहौल को गरमाते नहीं हैं तो मुशर्रफ कुछ और साल के लिए सत्ता में बने रहेंगे और इसके लिए लोग उन्हें माफ नहीं करेंगे। एक बड़ा सवाल यह भी है कि पाकिस्तान के राजनेताओं का इतना असर है भी कि नहीं कि वे आम लोगों को सड़कों पर निकलने के लिए प्रेरित कर सकें।
क्या इसे पाकिस्तान के हताश और वंचित तबके का मुख्यधारा की राजनीति से पूरी तरह नाउम्मीद होने का संकेत माना जा सकता है? सवाल यह भी है कि क्या यह तबका इस्लामी जेहादियों द्वारा क्रांतिकारी बदलाव लाए जाने के इंतजार में है।
(अगली किस्त सोमवार के अंकमें)