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लाडला टीवी

दो से ग्यारह वर्ष की उम्र के बच्चे सप्ताह में औसतन एक पूरा दिन टीवी देखते बिताते हैं। इस दिशा में हुए अध्ययन भी बताते हैं कि एक परंपरागत भारतीय परिवार में ज्यादा टीवी देखने वाले बच्चे कम सामाजिक भी निकलते हैं। लगभग सात घंटे टीवी रोजाना देखा जाता है। छह से 17 वर्ष के बच्चे और किशोर तीन से चार घंटे प्रतिदिन टीवी देखते हैं। इसका असर बच्चों के स्वास्थ्य समेत उनके मस्तिष्क पर पड़ता है और वे देखे गए दृश्यों के हिसाब से अपनी सोच विकसित करते हैं। ऐसे में यह जिम्मेदारी अभिभावकों की बन जाती है कि वे बच्चों की टीवी देखने की आदत को सकारात्मक दिशा दें।

मनोवैज्ञानिकों की राय
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की टीवी देखने की आदतों को बदलना चाहते हैं तो पहले माता-पिता अपनी आदतों में बदलाव लाएं। टीवी देखने का समय निर्धारित करें। बच्चे को टीवी देखने से मना करना या केबल कनैक्शन कटवाना इसका इलाज नहीं। इससे तो बच्चे क्रोधित हो जाते हैं, क्योंकि टीवी एक जरूरत भी है। माता-पिता सारे प्रोग्राम देखने के बाद बच्चे की पसंद के प्रोग्राम में से उससे पूछकर समय तय करें कि एक दिन में वह कोई एक या दो प्रोग्राम देखेगा। बच्चों के कमरे में टीवी न रखें। ज्यादातर ऐसे कार्यक्रमों का चुनाव करें जो परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर देख सकें।

डॉक्टर की सलाह
शिशु रोग विशेषज्ञों के अनुसार टीवी का सबसे ज्यादा असर बच्चे के शारीरिक विकास पर पड़ता है। टीवी देखने के कारण बच्चे खेलते नहीं हैं, जिससे शारीरिक क्रियाशीलता कम हो जाती है। दोस्तों से मिलना-जुलना कम हो जाता है इससे वे कम सामाजिक होते हैं। नतीजतन बच्चों का प्राकृतिक विकास प्रभावित होता है। जो बच्चे नजदीक से लगातार 5 से 6 घंटे टीवी देखते हैं उन्हें कम उम्र में ही आंखों से संबंधित समस्याएं शुरू हो जाती हैं। टीवी देखते हुए बच्चे कुछ न कुछ खाते रहते हैं इससे मोटापा भी बढ़ता है।

टीवी और हिंसा का संबंध
किसी भी प्रकार की हिंसा को टीवी पर देखने का सबसे बड़ा खतरा बच्चे द्वारा हिंसा का पाठ सीखना होता है। उसे देख बच्च हिंसक ढंग से व्यवहार करना सीख सकता है। रोजमर्रा से जुड़ी हिंसा उसे एक आम घटना की तरह लगने लगती है। इस दिशा में हुए अध्ययनों ने भी यह पाया है कि हिंसक कार्यक्रमों को देखने वाले बच्चों में आक्रामकता अधिक पाई गई। उनकी यह आक्रामकता उनके अपने खिलौनों और साथी दोस्तों पर निकलती है। दूसरी तरफ हिंसक कार्यक्रम कम देखने वाले बच्चों में आक्रामकता का स्तर बहुत कम पाया गया।

टीवी देखना अच्छा है, बशर्ते
* कार्यक्रम उनकी रचनात्मकता में वृद्धि के साथ नई सोच को जन्म दे।
* उन्हें जिज्ञासु बनाए यानि सोचने और प्रश्न पूछने को प्रेरित करे।
* सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करे।
* पढ़ने को प्रेरित करे।
* महत्वपूर्ण मूल्यों को स्थापित करें।
* सीखने की आदत डाले और इस दिशा में लगातार प्रेरित करे।
* दूसरी संस्कृतियों को समझने व उनका सम्मान करना सिखाए।
* स्वस्थ मनोरंजन करे।

टीवी एक समस्या है, जब
* जब किसी समस्या के समाधान के लिए उन्हें हिंसक बनाए। पैर पटकना, चीखना-चिल्लाना, मार-पीट पर उतारू होना सरीखे संकेत नकारात्मक हैं।
* उनका अधिकांश समय टीवी देखते हुए बीते।
* बच्चे बड़ों के कार्यक्रमों को भी रुचि लेकर देखें।
* विभिन्न उत्पादों को टीवी पर देख उन्हें खरीदने की जिद करे।
* नकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करे।

टीवी देखने का संतुलित रवैया
* अपने बच्चे के क्रियाकलापों, जिसमें टीवी देखना, होमवर्क करना और खेलना शामिल है, उसका एक चार्ट बनाएं। फिर उसे बच्चे के सर्वागीण विकास को ध्यान में रखते हुए एक संतुलन दें।

* सप्ताह के हिसाब से बच्चे में टीवी देखने की एक निश्चित मात्रा निर्धारित करें। नजर रखें कि बच्च आप द्वारा निर्धारित कार्यक्रम देख रहा है या नहीं।* उसे समय के हिसाब से योजनाबद्ध ढंग से टीवी देखने को प्रेरित करें। इससे उसकी पढ़ाई का भी नुकसान नहीं होगा।

* ध्यान रखें कि बच्च अपने अभिभावकों से ही सीखता है। ऐसे में अगर आप स्वयं अधिक टीवी देखते हैं तो इसकी संभावना ज्यादा है कि आपका बच्च भी अधिक टीवी देखेगा।

* मनोरंजन और अन्य गतिविधियों में एक संतुलन स्थापित करना बहुत जरूरी है। इसके बाद ही उनका सर्वागीण विकास हो सकेगा।





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