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गोलपोस्ट के पास चकमा देती बॉल

परदे के पीछे.हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग लंदन के साउथॉल नामक इलाके में इतनी अधिक संख्या में बसे हैं कि वह इलाका इंग्लैंड का न होकर साउथ एशियन कॉलोनी बन चुका है। अंग्रेजों के लिए यह भूलना कठिन रहा है कि उन्होंने दो सौ साल तक इन काले और भूरों पर हुकूमत की है तथा अब उनके अपने सफेद देश में ये काले और भूरे कामयाब और खुश हैं।

इतिहास का चक्र ऐसा घूमा है कि अंग्रेज ड्राइवर की नौकरी कर रहा है और भूरा मालिक गाड़ी में पीछे शान से बैठा है। जातिवाद और नस्लवाद से इंग्लैंड मुक्त नहीं है और भेदभाव आज भी जारी है। साउथ एशियन लोगों के अपने क्लब हैं और यह मात्र क्लब नहीं हैं, वरन उनकी अपनी अस्मिता है, उनकी पहचान है। विदेश की धरती पर अपने वतन की याद का परचम इन क्लबों में फहराया जाता है। जॉन अब्राहम और बिपाशा बसु अभिनीत ‘गोल’ ऐसे ही क्लब को बचाने की कहानी है।

इस फिल्म के संदर्भ में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि फुटबॉल इंग्लैंड में महज खेल नहीं है, वरन एक जीवनशैली है। यह आम अंग्रेज के लिए साम्राज्यवाद से ज्यादा गहरा नशा है। गौरतलब है कि संयत व्यवहार और अल्पभाषी होना अंग्रेज संस्कृति का हिस्सा है, परंतु उनके यहां होली जैसे त्योहार नहीं हैं, जिसमें भीतर दबा हुड़दंगी स्वयं को जाहिर कर सके। इसलिए फुटबॉल उनके लिए होली है, जिसमें वे असंयत और अभद्र होने का अवसर खोजते हैं।

इस फिल्म में साउथ एशियन एकता और फुटबॉल दोनों को जोड़ दिया गया है। राष्ट्रवादी भावना का असर इसमें शायद दर्शक कम महसूस करे, क्योंकि यह उसकी माटी के मान की बात नहीं है। ‘चक दे इंडिया’ और ‘लगान’ वाली लहर नहीं बन सकती। इसी तरह फुटबॉल भी हमारे यहां क्रिकेट या हॉकी की तरह नहीं है। राष्ट्रप्रेम की संकरी गली में फुटबॉल खेलने का प्रयास सीमित वर्ग को ही पसंद आ सकता है।

मध्यांतर के पहले वाला भाग लंबा लगता है, क्योंकि दर्शक ऊब जाता है और उसे ‘चक दे इंडिया’ का फुटबॉल संस्करण लगता है। मध्यांतर के बाद घटनाक्रम गति पकड़ता है और आखिरी आधे घंटे में बात सम पर आती है। फुटबॉल खेल के दृश्य उतने रोचक और विश्वसनीय नहीं बने, जितने इस तरह की हॉलीवुड फिल्मों में दिखाए जाते है। फिल्म में लंदन की गलियां, और मैदान जीवंत रूप में प्रस्तुत हैं। इसमें प्रेम कहानी को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है।

के चरित्र परिवर्तन में नायिका से ज्यादा महत्व पिता-पुत्र रिश्ते को दिया गया है। फिल्मकार ने केवल ‘बिल्लो रानी’ वाला गीत कथानक से समझौता करके ठूंसा है और लंदन के अंगने में बिहार खड़ा करने का फूहड़ प्रयास किया है। अरशद वारसी, बोमन ईरानी, जॉन अब्राहम और बिपाशा ने बढ़िया काम किया है।

यह अजीब सी बात है कि कथानक से न्याय करने वाले अभिनय को पूरी तकनीकी गुणवत्ता से प्रस्तुत किए जाने के बावजूद आखिरी पंद्रह मिनट छोड़कर कहीं भी फिल्म हृदय को स्पर्श क्यों नहीं करती? दर्शक यह भांप लेता है कि अगला घटनाक्रम क्या है या किस भावना को प्रस्तुत किया जाने वाला है। शायद यह प्रेडिक्टेबिलिटी ही भावना को उभरने नहीं देती। पूरी फिल्म उस पेनाल्टी किक की तरह है जो क्रॉस बार से ऊपर चली जाती है। फिर भी बढ़िया खेले।





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