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धरोहर व स्मृतियों को सहेजने की कोशिश

करनाल.विंटेज एवं क्लासिक कारों की ‘हेरिटेज हिल ड्राइव’ शुक्रवार को करनाल पहुंची और उनका शहर में जोरदार स्वागत किया गया। दिल्ली से कसौली जाने वाली इस यात्रा का उद्देश्य लोगों को धरोहर और स्मृतियों को संजोने के लिए प्रेरित करना है।

आटोमेटिक हेरिटेज ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित इस यात्रा में 1927 से 1990 तक की चार सिलेंडर की स्टैंडर्ड कोवेइट्री और 1927 से लेकर 1990 की प्रोस्च्यू तक शामिल हैं। यात्रा के संयोजक विजेंद्र गुप्ता और डिम्पी कपूर का कहना है कि उन्हें बेहद रोमांच महसूस होता है।

1927 से 1990 तक की ऐतिहासिक झांकीभारत की आजादी के पूर्व से आधुनिक भारत तक लग्जरी कारों के इस कारवां में विनोद कपूर की स्टैंडर्ड कोवेइंट्री (1927), कंचन कपूर की हम्बर (1931), देवेश शर्मा की फोर्ड वी-8(1938), राना जी सूद की फोर्ड जीप (1942), तरुण ठकराल की ब्यूक सुपर-8(1946), विवेक श्रीवास्तव की सेवरलेट (1947), गुरप्रीत सिंह की मर्सिडिज 170एस(1947), गौरव गुलाटी की डाज किंग्सवे (1953) में शामिल हैं। इसके अलावा रश्मी पटेल की डाज किंग्सवे (1956), राजीव जोसेफ की पोलीमाथ सुनबम (1956), कंचन कपूर की सेवरलेट बिल्यर (1957), टूटू धवन की जगुआर मार्क टू (1962), विजेंद्र गुप्ता की मर्सिडिज 230 (1964), डिंपी कपूर की रोल्स रायल्स सिल्वर सैडो (1956), रोमी कपूर की मर्सिडीज 200 (1966), संदीप कटारी की मर्सिडीज 250 एस(1967), सैम मैथ्यूज की मर्सिडीज 230 (1983), मल्लिका साहनी की वोल्कवैग्स बिटल (1983), मनिष गुप्ता की मर्सिडीज 240 (1990) की गाड़ियां शामिल थीं।

बुजुर्गो की तरह रखता हूं ख्याल : कपूर25 विंटेज कारों के मालिक डिम्पी कपूर का कहना है कि इन गाड़ियों का रखरखाव अपने परिवार के बुजुर्गो की तरह रखता हूं। हालांकि यह शौक काफी खर्चीला है। ये गाड़ियां एक लीटर पेट्रोल में एक से दो किलोमीटर का एवरेज देती हैं। तब्दीली के नाम में इनमें सिर्फ ब्रेक में परिवर्तन किया गया है।

धरोहर के प्रति उदासीन हैं लोगकंचन, देवेश शर्मा, रश्मी पटेल का कहना है कि सड़कों पर चलने का सेंस अब तक लोगों में नहीं आया। यात्रा के दौरान अपने अनुभव बताती हेरिटेज गाड़ियों की इन महिला चालकों का कहना है कि अपने बुजुर्र्गो में इन धरोहर के प्रति लोगों सम्मान का भाव नहीं है।

आटोमेटिक हेरीटेज ट्रस्ट के चेयरमैन डिम्पी कपूर और संरक्षक विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि 1970 में विदेशों में विंटेज कारों का जब क्रेज बढ़ा तो भारत से बड़ी संख्या में विंटेज कारें बाहर जाने लगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन कारों के आयात-निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें प्रतिबंधित कर दिया।

भारत में फिर भी काफी गाड़ियां बची रह गई थीं। लिहाजा हमने एक ट्रस्ट बना कर विदेश की तरह यहां के लोगों को दिन प्रतिदिन विकासशील आटोमोबाइल उद्योग के बीच पुरानी शान की सवारियों को संभालना शुरू किया, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां भी जाने कि तब कैसी गाड़ियां बनती थी।

मुझे तो लगता है कि मैं ‘परिणिता’ हूं16 वर्षीया अर्शिया मेहता कहती हैं कि जब रोल्स रायल्स में सवार होकर निकलती हूं तो लोग हाथ हिलाते हैं, यूं लगता है मानो मैं परिणिता की एश्वर्या राय हूं। इसी तरह 19 वर्षीया चांदनी व 16 वर्षीया रेशमा का कहना है कि पुराने जमाने के गानों की धुनों के बीच सोफे सरीखी आरामदेह सीट पर विंटेज कार में घूमने के आनंद को भुलाया नहीं जा सकता है।





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