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अभिमत. राष्ट्रमंडल के महासचिव पद के लिए हुए चुनाव में भारत के वरिष्ठ राजनयिक कमलेश शर्मा की विजय को संयुक्त राष्ट्र के चुनाव में शशि थरूर के पराजय की भरपाई भले ही न माना जाए, लेकिन दुनिया के तिरेपन देशों की बिरादरी का नायकत्व भारत को मिलना अंतरराष्ट्रीय फलक पर निश्चित ही एक कामयाबी ही मानी जाएगी।
यद्यपि राष्ट्रमंडल उन तिरेपन देशों का समूह है जो कभी न कभी ब्रिटेन के उपनिवेश रहे हैं, फिर भी आज के बदलते संदर्भ में जहां न कोई किसी का मालिक और न कोई किसी का गुलाम है, ऐसे में लगभग 1.8 अरब लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी संगठन की भूमिका विश्व जनमत को प्रभावित करने में काफी अहम हो जाती है।
भारत आज दुनिया की तेजी से उभरती हुई आर्थिक ताकत वाले देश के रूप में जाना जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वह विश्व का सिरमौर है। शक्ति संतुलन की दृष्टि से वह एशिया के सबसे प्रभावी देशों में एक है। भारत पिछले कई वर्षो से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए प्रयासरत है। ऐसे में यदि उसे दुनिया के विस्तृत भूभाग में फैले देशों का नायकत्व मिला है तो विश्व मंच पर और आगे बढ़ने का उसका रास्ता ही प्रशस्त होगा।
फिलहाल ब्रिटेन में उच्चयुक्त कमलेश शर्मा जब अप्रैल में न्यूजीलैंड के डॉन मैकिनन से राष्ट्रमंडल के महासचिव का पद भार संभालेंगे तब उन्हें वैश्विक आतंकवाद और ग्लोबल वार्मिग के खतरों की चुनौतियां विरासत के रूप में मिलेंगी। वहीं कंपाला बैठक में राष्ट्रमंडल ने पाकिस्तान को अपनी बिरादरी से अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है। पाकिस्तान पर समूची दुनिया का दबाव है कि वहां निष्पक्ष चुनाव कराकर शीघ्रातिशीघ्र लोकतंत्र को बहाल किया जाए। भारत और पाकिस्तान की अदावत भी जगजाहिर है, ऐसे में राष्ट्रमंडल के महासचिव के रूप में कमलेश शर्मा का राजनयिक कौशल कसौटी पर रहेगा।