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सम्पादकीय. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की तीन महीने में दूसरी बार हुई स्वदेश वापसी पाकिस्तान में आठ जनवरी को होने वाले चुनावों पर कमोबेश असर डाल सकती है मगर जब तक राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ और नवाज शरीफ के बीच हुए राजनीतिक सौदे अथवा समझौते का खुलासा नहीं होता तब तक शरीफ की वापसी के निहितार्थ निकालना जल्दबाजी ही होगी। 10 सितंबर को स्वदेश लौटने पर बुरी तरह अपमानित करके फिर से निर्वासित किए गए शरीफ जनरल मुशर्रफ से इस कदर खफा थे कि उन्होंने 20 नवंबर को उनसे मिलने जेद्दाह पहुंचे मुशर्रफ या उनके किसी प्रतिनिधि से मुलाकात करने से दो-टूक इनकार कर दिया था।
ऐसे में सहज जिज्ञासा होती है कि आखिर इस दौरान ऐसा क्या घटा कि मुशर्रफ ने ताबड़तोड़ शरीफ की वापसी के रास्ते खोल दिए और शरीफ ने भी वतन वापसी का फैसला कर लिया। कहा जा रहा है कि सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज ने मुशर्रफ से रियाद में हुई मुलाकात के दौरान बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान वापसी का हवाला देकर शरीफ की भी स्वदेश वापसी पर जोर दिया था मगर शरीफ की वापसी का यह अकेला कारण नहीं हो सकता।
ऐसे में बहुत संभव है कि अब तक मुशर्रफ को प्रश्रय देते आ रहे अमेरिका ने उन पर शरीफ की वापसी तथा चुनावों में उन्हें भाग लेने देने के लिए दबाव डाला हो। और अमेरिका के लिए ऐसा करना इसलिए जरूरी हो गया कि पाकिस्तान में मुशर्रफ की स्वीकार्यता रसातल में पहुंच चुकी है तथा उन्हें और ढोते रहने से अमेरिका को अपने हित प्रभावित होने का अंदेशा हुआ हो। अमेरिका की इस इच्छा को टालना मुशर्रफ के लिए संभव भी नहीं था। साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य तथ्य है कि मुशर्रफ को राष्ट्रपति चुनाव के पहले शरीफ की स्वदेश वापसी पर एतराज था। राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम की आधिकारिक घोषणा के बाद उनका यह एतराज अप्रासंगिक हो गया था।
अब सवाल है कि नामांकन भरने की तारीख खत्म होने के महज एक दिन पहले वतन लौटे शरीफ क्या इमरजेंसी के तहत हो रहे चुनावों में कोई प्रभावी भूमिका निभा पाएंगे। चुनावों की तैयारी के लिए उनके पास वक्त नहीं है और चुनावों का बॉयकाट करके वे मुशर्रफ समर्थक पार्टियों और बेनजीर की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की राह आसान कर रहे होंगे। ये दोनों विकल्प एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई की तरह हैं। फिर भी शरीफ सात साल बाद खुद को अपने वतन में, अपने लोगों के बीच पाने का संतोष तो कर ही सकते हैं।