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‘इंडियन बर्ड’ में ‘एवियन इनफ्लूएन्जा’ की आशंका

बीकानेर. रूस और चीन से आने वाले अप्रवासी पक्षियों की जिले में दस्तक होने के साथ ही ‘इंडियन बर्ड’ में ‘एवियन इनफ्लूएन्जा’ की आशंका जताई जाने लगी है। इसी को देखते हुए कोलायत व गजनेर के पास जल स्रेातों से पक्षियों के नमूने पशुपालन विभाग के जयपुर प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजे गए हैं। इन विदेशी मेहमानों के साथ कई तरह के वायरस आते हैं जो भारतीय पक्षियों के लिए मौत का पैगाम होता है।

सर्दी की दस्तक के साथ भारत में कई ऐसे विदेशी पक्षी मेहमान आ रहे हैं। कई दिनों से कोलायत व गजनेर के जलस्रोतों के पास इन पक्षियों को देखा जा रहा है। पशुपालन विभाग ने पक्षियों में रोग की आशंका होने पर दस इंडियन बर्ड के सैंपल जांच के लिए हैं। क्षेत्र में इन विदेशी पक्षियों को देख विभागीय अधिकारी सतर्क हो गए हैं। बताया जाता है कि इन पक्षियों में ग्रे लेग गूज, शॉवलर तथा पोचर्डस शामिल हैं। हालांकि बार हेडेड गूज की गूंज नहीं सुनाई नही दी।

पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ.करतार सिंह ने बताया कि जिले के कोलायत, गजनेर, चूरू सहित प्रदेश में जहां भी जलस्रेात हैं वहां खास चेतावनी बरतने के लिए कहा गया है। कोलायत व गजनेर से इसी आशंका को देखते हुए दस सैंपल जांच के लिए जयपुर भेजे हैं। उन्होंने कहा कि इंडियन बर्ड में यह रोग होने की संभावना कम ही हैं लेकिन सुरक्षा कारणों को देखते हुए विभाग किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहता।

सिंह ने संभाग के सभी उपनिदेशकों को जिले की टीम का लीडर बनाते हुए कहा कि चिकित्सक रोगग्रस्त पक्षियों का इलाज करने के लिए तैयार रहें। समय-समय पर स्वस्थ पक्षियों के सैंपल की जांच कराते रहें। चूंकि ये पक्षी पकड़ में नहीं आते इसलिए इनके खून का सैंपल संभव नहीं है इसलिए बीट के सैंपल जयपुर भेजे हैं।

* विभाग ने दो सप्ताह पहले दस सैंपल जांच के लिए जयपुर भेजे थे। उनकी रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। सुरक्षा ही बचाव का आधार मानते हुए सैंपल की जांच की जा रही है। वैसे नियमित रूप से भी सैंपलों की जांच होती रहती है।
-सुभाष गोदारा, सहायक निदेशक , क्षेत्रीय रोग निदान प्रयोगशाला

क्या है रोग व कैसे फैलता है
यह एक वायरस जन्य पक्षियों का रोग है। सौ प्रतिशत तक मृत्युदर है। इसमें श्वांस व पाचन तंत्र प्रभावित होता है। मुर्गी,टर्की, बतख, वाटर फाउल आदि पक्षी शीघ्र ग्रसित होते हैं। रोग आर्थोमिक्सोविरिडी परिवार के इनफ्लूएन्जा जाति के ए-टाइप के वायरस से फैलता है। वायरस की 15 उपजातियां होती हैं जिनमें एच-5 व एच-7 उप जाति से पक्षियों में प्राणघातक अति संक्रामक रोग फैलता है। यह रोगग्रस्त पक्षी की लार, नासास्राव तथा बीट में पाया जाता है। सामान्यतया इनफ्लूएन्जा से मनुष्यों में रोग उत्पन्न नहीं होता लेकिन इस वायरस से निरंतर उपजातियां विकसित होती रहती हैं जिससे कुछ जातियां मनुष्यों के लिए घातक हो सकती हैं।

रोग के लक्षण
पक्षियों में- अचानक अधिक संख्या में पक्षियों की मृत्युदर । पक्षियों में सुस्ती व खाना-पीना बंद। अंडा उत्पादन में अत्यधिक कमी, कलंगी व लटकन पर सूजन एवं नीलापन, चोंच और नासाछिद्र से स्राव जो रक्त भी हो सकता है।

मनुष्यों में- जुकाम होना व आंखों का लाल होना। सांस लेने में तकलीफ। ज्वर व मांसपेशियों में तकलीफ तथा निमोनिया का एक साथ होना।





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