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सुरों की महफिल में पटाखों का खलल

भोपाल. भोपाल आए गुलाम अली को सुनने के लिए रविवार शाम रवीन्द्र भवन में मानों सारा शहर उमड़ पड़ा।

गुलाम अली की दिलक श आवाज सुनने कितने ज्यादा लोग आए, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रवीन्द्र भवन से लेकर पॉलिटेक्निक चौराहे व मछलीघर तक और प्रोफेसर कॉलोनी की गलियों में भी श्रोताओं की गाड़ियों की भीड़ देखी गई। गाड़ियों का ऐसा जमावड़ा शहर में पहले किसी कार्यक्रम के दौरान नहीं देखा गया।

हालांकि इस बेहद कामयाब आयोजन में शादियों में चलाए जाने वाले पटाखों की आवाज ने खलल भी डाला। गजल बादशाह ने इस पर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि मैं सिर्फ आप लोगों के लिए ही गा रहा हूं नहीं तो महफिल छोड़कर चला जाता। अपनी गजल पेश करने से पहले उन्होंने खुशी भी जाहिर की और कहा कि, ‘कोई खुश हो न हो, मैं यहां आकर बहुत खुश हूं। वो बोले कि भोपाल का नाम बड़ा ही ट्रेडिशनल है। भोपाल और भोपाली भी एक तरह के राग हैं,’।

‘वो उन्हें याद करें जिसने भुलाया हो कभी हमने उनको न भुलाया न कभी याद किया’

ये शेर पेश कर उन्होंने महफिल की शुरूआत की और दर्शकों से मुखातिब होकर कहा, ‘रोज कहता हूं भूल जाऊं उसे, पर रोज यह बात भूल जाता हूं।’

‘मैं खयाल हूं किसी और का, मुझे सोचता कोई और है, सरे आइना मेरा अक्स है, पसे आइना कोई और है।’

गुलाम अली ने जब ये गजल पेश की तो पूरी महफिल रोशन हो गई और जोरदार तालियां गूंज उठीं।

करूं न याद मगर किस तरह भुलाऊं उसे, गजल बहाना करूं और गुनगुनाऊं उसे

इस शेर के साथ उन्होंने अपनी गजल पेश की-

‘रूह जब वज्द में आए वो गजल होती है, या कोई दिल को दुखाए तो गजल होती है।’

‘फासले ऐसे भी हों ये कभी सोचा न था’

मजाकिया लहजा :
गजल की इस महफिल में गुलाम अली साहब बीच-बीच में मजाकिया लहजे में भी नजर आए। कभी वे दर्शकों से तो कभी अपने साथी संगतकारों से मजाक करते दिखे। तबला वादक ने जैसे ही जोश में तबला बजाया तो उन्हें तुरंत कहा ये नौजवान जरा ज्यादा ही जोश में है।

मैं सिर्फ आपके लिए गा रहा हूं :
पॉलीटेक्निक चौराहे से गुजर रही बारात और बीच-बीच में फूटते पटाखों ने उन्हें परेशान किया। उन्होंने अपनी परेशानी का बयान कुछ इस तरह किया, ‘मैं सिर्फ आप लोगों के लिए ही गा रहा हूं , अमूमन मैं खुले मैदान में गजल पेश करने के पक्ष में कभी नहीं रहा।’ उन्होंने तर्क दिया कि पटाखे तो कहीं भी आ सकते है, उनका अपना शौक है, अपनी जूस्तजू।





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