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एक थी नन्ही ‘अंतिमा’..

अजमेर. अंतिमा नहीं रही! सुनने वाले अवाक रह गए। अंतिमा की मासूम मुस्कान आंखों के सामने घूम गई। किसी को भी यकीन नहीं हुआ कि एक नन्हे फरिश्ते एक थी नन्ही अंतिमासे जिंदगी रूठ गई है। लेकिन अनहोनी तो हो चुकी थी। कलेजे पर पत्थर रखकर हकीकत का सामना करना ही पड़ा। फिर अंतिमा की मुस्कान याद आई तो पलकों का बांध आंसुओं को नहीं रोक पाया।

कुंदननगर के माली मोहल्ला में रहने वाले होमगार्ड के जवान रमेश चौहान के घर-आंगन में रविवार सुबह नौ बजे तक सब कुछ ठीक था। चौहान की डेढ़ साल की बिटिया अंतिमा रोजाना की तरह कमरे में चहक रही थी, कभी घुटनों के बल दौड़ लगाती तो कभी हवा में हाथ हिलाकर खिलखिलाती। जैसा कि चौहान के बड़े भाई त्रिलोकसिंह ने बताया, कमरे में रखा हर सामान अंतिमा के लिए खिलौना ही तो था। उसकी मां और परिवार के अन्य लोग घर के कामकाज में जुटे थे।

इधर, सबसे बेखबर अपनी दुनिया में खोई अंतिका टीवी ट्रॉली का सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश कर रही थी। अचानक, संतुलन बिगड़ने से ट्रॉली और उस पर रखा टीवी मासूम पर गिर पड़ा। अंतिका के सिर में गहरी चोट लगी और कान से खून बहने लगा। आनन-फानन में चौहान और परिवार के लोग उसे लेकर जेएलएन अस्पताल पहुंचे, लेकिन रास्ते में ही अंतिमा वहां चली गई, जहां से कोई वापस नहीं आता।





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