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सांपला के कत्थे से बंगाल तक होंठ लाल

सांपला(रोहतक).सांपला का कत्था यूपी से लेकर बंगाल तक पान की गिलौरी पर सजकर लोगों के होठों की लाली बढ़ा रहा है। एक अनुमान के हिसाब से प्रति माह करीब 350 टन कत्था सांपला की फैक्टरियों में तैयार करके देश भर में भेजा जाता है। सिर्फ सात से आठ साल में ही कत्था उद्योग यहां पनपा है।

हाइवे नं. दस गांधरा मोड़ पर लगी फैक्टरियों में यह कत्था तैयार हो रहा है। आए दिन इस कत्थे की डिमांड बढ़ती जा रही है। इन फैक्टरियों में बनने वाला कत्था दिल्ली, बिहार, यूपी, गुजरात, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल के पान स्टाल वाले व दवा विक्रेता काफी मात्रा में प्रयोग कर रहे हैं। एक कत्था निर्माता ने नाम न देने की शर्त पर बताया दिल्ली करीब होने की वजह से कत्था सप्लाई में दिक्कत नहीं आती।

क्या होता है कत्थे का फायदा

कत्थे का सेवन लोग केवल खाने में ही नहीं, अपितु यह देशी व अंग्रेजी दवाओं में भी प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेदिक डा. श्री कृष्ण व राजपाल देशवाल ने बताया कि कत्थे से तैयार होने वाली दवाइयां स्त्री रोग, गले के रोगों में ज्यादा प्रयोग होती हैं। इसका उपयोग पान-मसाला आदि में किया जाता है।

कहां से आती है लकड़ियांकत्था तैयार करने में प्रयोग होने वाली खैर की लकड़ी हरियाणा में सिर्फ यमुनानगर के कुछ ही क्षेत्र में मिलती है। इसका वृक्ष पहाड़ी क्षेत्र में पैदा होता है। ज्यादातर लकड़ी हिमाचल, गुजरात व पंजाब से मंगाई जाती है। खैर के पेड़ की लंबाई सिर्फ 10-12 फीट की ही होती है। पेड़ तैयार होने में 15-18 वर्ष तक का समय लगता है। यह लकड़ी फैक्टरी मालिकों को 20 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदनी पड़ती है।

चालीस दिन में होता है एक बिस्कुट तैयार :

कत्था तैयार करने से पहले लकड़ी को छोटे-छोटे टुकड़ों में छाल के रूप में काट लिया जाता है। उसके बाद मशीन में डाल देते हैं। फैक्टरी मालिक रमेश ने बताया कि पूरी तरह कत्था तैयार करने में करीब 40 दिन लग जाते हैं। उसके बाद उसको बिस्कुटों के रूप में तैयार कर पैक कर दिया जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन-चार वर्षो से कत्थे की डिमांड बढ़ती जा रही है। डिमांड के हिसाब से ही माल तैयार किया जाता है।

कत्थे पर विदेशों में लगी पाबंदी : कत्थे की सप्लाई कर देश के तीन राज्यों महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडू के अलावा विदेशों में भी सप्लाई पर पाबंदी है।





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