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‘देश में पीडियाट्रिक पैथोलॉजिस्ट कम’

चंडीगढ़. ‘देश की जनसंख्या का 34 फीसदी हिस्सा बच्चे हैं। बच्चों को जन्म से पहले से लेकर किशोर होने तक कई बीमारियों का सामना करना पड़ता है, इसीलिए आज पीडियाट्रिक पैथोलॉजिस्क की सख्त जरूरत है, जो बच्चों की बीमारी को ठीक से डायग्नोज कर सके।’ यह बात अमेरिका से आए डॉ. वी.वी. जोशी ने पीजीआई के हिस्टोपैथोलॉजी डिपार्टमेंट द्वारा कराई जा रही सीएमई के दौरान कही।

डॉ. जोशी ने कहा कि भारत में पीडियाट्रिक पैथोलॉजिस्ट्स की बहुत कमी है, इसीलिए जरूरत ज्यादा पीडियाट्रिक पैथोलॉजिस्ट तैयार करने, पीडियाट्रिक पैथोलॉजिस्ट की पोस्टें क्रिएट करने व फंडिंग देकर इसे प्रोत्साहित करने की है। दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ पैथोलॉजी की डायरेक्टर डॉ. सुनीता सक्सेना ने कहा ‘जीनोमिक स्टडी से एक साथ दस जींस पहचाने जा सकते हैं, इससे बीमारी को जल्दी पकड़ने में मदद मिल रही है। यह पता लगाना भी आसान हो गया है कि किस पेशेंट पर क्या दवा असरदार होगी।।’

पीजीआई की डॉ. राधिका ने कहा, ‘बच्चों में होने वाले कुछ कैंसर के लक्षणों में बहुत कम अंतर होता है, लेकिन फिश टैक्नीक से इनमें भेद किया जा सकता है। सही बीमारी डायग्नोज कर सही समय पर इलाज किया जा सकता है।’ नई दिल्ली, एम्स के डॉ. अशोक ने बताया कि कैसे कोन फोकल माइक्रोस्कोपी से जीन में आ रहे बदलाव व उसके बाद सेल में हो रहे परिवर्तन को आसानी से देखा जा सकता है।

पीजीआई के मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड प्रो. मीरा शर्मा ने इस बात पर जोर दिया कि ट्यूबरक्लोसिस को डायग्नोज करने और उसके इलाज में मोल्यूकुलर डाग्नोस्टिक टैक्नीक्स कितनी जरूरी हैं। पीजीआई के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के हेड डॉ. एस.के. जिंदल ने ट्यूबरक्लोसिस के इलाज और ट्रीटमेंट के लिए आ रहे नए कॉन्सेप्ट की जानकारी दी।





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