अभिमत. दिल्ली में पाकिस्तान के खिलाफ खेले गए पहले क्रिकेट टेस्ट में टीम इंडिया के थर्टी प्लस के पांचों ही खिलाड़ियों ने अपना दम-खम दिखाकर साबित कर दिया कि वे अभी चुके नहीं हैं और उन्हें संन्यास लेने और टीम से बाहर करने की सलाह देने वाले सही नहीं हैं। मैच में सात विकेट लेने वाले 37 साल के लेग स्पिनर और टीम इंडिया के कप्तान अनिल कुंबले ने मैन ऑफ द मैच का अवार्ड जीतकर साबित कर दिया कि खेल में उम्र नहीं, फिटनेस देखी जानी चाहिए। दिल्ली टेस्ट जीतने में अपना-अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर 30 प्लस के अन्य खिलाड़ियों-सचिन तेंडुलकर नाबाद, सौरव गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ ने भी जता दिया कि उनके खेल पर उम्र का कोई असर नहीं है।
दिल्ली टेस्ट भारत ने 30 प्लस के खिलाड़ियों के ही दम पर जीता है। भारत के अलावा सिर्फ ऑस्ट्रेलिया ही ऐसी टीम है जो 30 प्लस के सहारे कमाल का प्रदर्शन करती आ रही है। भारत में उम्रदराज खिलाड़ियों के खिलाफ अक्सर आवाज उठाई जाती है लेकिन यह नहीं देखा जाता कि उनका पिछला योगदान क्या है और वर्तमान फॉर्म कैसा है। सिर्फ विरोध के लिए विरोध किए जाने का फैशन है। वैसे कम से कम टीम इंडिया के लिए चिंता की बात इसलिए भी नहीं है कि हमारी दूसरी पंक्ति भी तैयार है। रोहित शर्मा, सुरेश रैना, पीयूष चावला, मनोज तिवारी आदि के रूप में भविष्य के सितारे इंडिया-ए या अन्य अंतरराष्ट्रीय मैचों से अनुभव प्राप्त कर रहे हैं।
अत: यह मानकर चलना चाहिए कि जब 30 प्लस के खिलाड़ियों को लगेगा कि अब उनके खेल में जान नहीं है तो वे स्वयं ही मैदान छोड़ देंगे। दो-तीन साल में ऐसी स्थिति आनी ही है। सौरव ने कहा भी था कि उम्र को महत्व नहीं देना चाहिए। क्या दिल्ली टेस्ट में किए गए प्रदर्शन के बाद भी आलोचक सौरव को गलत कहेंगे?