आलेख. शेयर बाजार में विदेशी निवेश को लेकर हमारे जैसे विकासशील देशों में अकसर चिंता व्यक्त की जाती रही है, लेकिन अब बारी अमेरिका की है। अमेरिकी
विद्वानों के लिए आजकल सबसे बड़ी चिंता का विषय है चीन, रूस व भारत जैसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं और खाड़ी के तेल उत्पादक देशों के बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार। डॉलर का लगातार कमजोर होना इस आग में घी का काम कर रहा है।
दिवाली से पहले वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था कि अब समस्या है बढ़ते डॉलर प्रवाह के प्रबंधन की। उनके इस बयान में न सिर्फ भविष्य के संकेत छिपे हैं बल्कि यह भी कि विदेशी मुद्रा भंडार अब सिर्फ कवच की भूमिका में नहीं, तीर की भूमिका भी निभा सकता है। चीन का विदेशी मुद्रा भंडार 1400 अरब डॉलर से ज्यादा है। और भी कई देशों के पास डॉलर पर्याप्त मात्रा में हैं।
पिछले दिनों कुछ ऐसे संकेत भी आए हैं कि चीन और रूस अपने विदेशी मुद्रा भंडार से 200-200 अरब डॉलर के निवेशक फंड बनाने पर विचार कर रहे हैं जो न्यूयॉर्क स्टाक एक्सचेंज व लंदन स्टाक एक्सचेंज में निवेश करेंगे यानी ये फंड अमेरिका व ब्रिटेन के लिए एफआईआई होंगे। ये एफआईआई अपने-अपने देशों की सरकार से नियंत्रित होंगे। इनके निवेश व विनिवेश संबंधी फैसले संबंधित देशों के हितों, प्राथमिकताओं और रणनीति के तहत होंगे। यदि ये फंड गठित हो जाते हैं, तो सोचिए क्या परिदृश्य उभरेगा।
ये फंड इतने बड़े होंगे कि इनके फैसलों से अमेरिकी शेयर बाजार प्रभावित होगा। जैसे 1997 में दक्षिण-पूर्व एशिया एफआईआई निवेश के चलते संकट में आया था, वैसे ही ये फंड अमेरिका व यूरोप को संकट में डालने की कूवत वाले होंगे। इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून व अमेरिकी अखबारों के एडिट पेजों पर आजकल यह चिंता अकसर दिखाई दे रही है।
पिछले पखवाड़े आईएचटी में छपे एक लेख के मुताबिक यदि इन फंडों का पोर्टफोलियो 10-15 खरब डॉलर का हो गया, तो मुश्किल हो जाएगी। इस समय न्यूयॉर्क स्टाक एक्सचेंज का मार्केट कैपिटलाइजेशन इससे कम है। इस लेख में संभावना जाहिर की गई कि भारत और अन्य विकासशील देश भी इस राह पर चल सकते हैं और यह स्थिति बहुत खतरनाक होगी।
अमेरिकी सुपर बाजार पहले से ही मेड इन चाइना सामानों से भरे हुए हैं(यहां तक कि अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस 4 जुलाई के मौके पर मेड इन चाइना अमेरिकी झंडे सबसे ज्यादा बिकते हैं)। इसके अलावा खाड़ी देश, जो अभी तक इंडीविजुअल कैपासिटी में अपने डॉलर भंडार का निवेश स्टाक मार्केट में करते हैं, भी अपने डॉलर निवेश को संस्थागत जामा पहना सकते हैं। अमेरिका से है तो हर कोई त्रस्त, कोई बड़ी बात नहीं कि ये फंड कार्टेल का स्वरूप ले लें और अमेरिकी वित्तीय बाजार को नियंत्रित करने लगें।
डॉलर भी लगातार कमजोर हो रहा है। ओपेक की हाल में रियाद में हुई बैठक में यह बात उभरकर आई कि तेल व्यापार की मुद्रा डॉलर ही क्यों रखी जानी चाहिए। हालांकि ओपेक के आफिशियल कम्युनिकेशन में यह बात नहीं रखी गई है लेकिन ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने प्रेस कान्फरेंस में कहा कि डॉलर की गिरती कीमत से हम चिंतित हैं और हमने अपने-अपने वित्तमंत्रियों को तेल व्यापार किसी अन्य मुद्रा या कई मुद्राओं के बास्केट में करने को लेकर अध्ययन करने को कहा है। सऊदी अरब सोचता है कि भले ही हमारे पास एटम बम नहीं है लेकिन हम अपने तेल को तो अमेरिका के खिलाफ एटम बम की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। अमेरिका के होश ठिकाने लगाने के लिए इतना ही पर्याप्त होगा।
चीनी मुद्रा युआन पहले से ही अमेरिका के लिए मुश्किल खड़ी कर रही है। अगले हफ्ते दक्षिण अफ्रीका में हो रही जी-20 देशों की बैठक में यह मुद्दा जबरदस्त ढंग से छाने वाला है। अमेरिका की कोशिश है कि चीन पर सब देश दबाव बनाएं कि वह युआन को उसकी असली कीमत पर लाए, लेकिन चीन ने अभी से अड़ियल रवैया अपना रखा है। अलबत्ता, दिसंबर में वाशिंगटन में हो रही जी-7 की बैठक के लिए होमवर्क का काम इस बैठक में जरूर किया जा सकता है। लेकिन चीन का अब तक का रिकार्ड रहा है कि वह हर मुद्दे को अपने राष्ट्रहित से जोड़कर रखता है और उससे फिर वह कभी कोई समझौता तब तक नहीं करता, जब तक कि उसके हित न सध रहे हों।
आने वाले दिन अमेरिका के लिए कष्टकारी होने जा रहे हैं, इसका भान अमेरिकी लोगों को है। गैलप पोल के हालिया सर्वे में निकलकर आया है कि तीन चौथाई अमेरिकी मानते हैं कि उनके देश की अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है और आने वाले दिनों में विकास दर तेजी से गिरेगी। शायद इसीलिए अमेरिकी लोग अपने बच्चों को चाइनीज पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि बच्चों को चाइनीज पढ़ाना भविष्योन्मुखी सोच है क्योंकि जिसे अंग्रेजी आती होगी और चाइनीज भी, उसी को कैरियर की बेहतर संभावनाएं मिलेंगी।